पिथौरागढ़: भगवान शिव के भक्तों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा का इस वर्ष का सफर रविवार को पूरा हो गया। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में भारत-चीन सीमा से लगे लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गया दसवां और आखिरी जत्था भारत लौट आया। इसके साथ ही इस साल की कैलाश मानसरोवर यात्रा का आधिकारिक रूप से समापन हो गया।
अधिकारियों के मुताबिक, आखिरी जत्थे में शामिल 44 तीर्थयात्रियों ने रविवार सुबह 9 बजकर 20 मिनट पर लिपुलेख दर्रा पार किया और भारतीय सीमा में प्रवेश किया। यात्रा के दौरान कठिन पहाड़ी रास्तों, ऊंचाई, मौसम और बारिश जैसी चुनौतियों के बावजूद श्रद्धालुओं ने धार्मिक यात्रा पूरी की।
इस साल 477 श्रद्धालुओं ने की यात्रा
धारचूला आधार शिविर में तैनात आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में कुल 477 तीर्थयात्रियों ने हिस्सा लिया। इनमें 154 महिलाएं भी शामिल रहीं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा को देश की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है। सीमित समय, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और ऊंचाई वाले इलाकों से होकर गुजरने के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु हर साल इस आध्यात्मिक यात्रा में शामिल होते हैं।
इस वर्ष भी देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने यात्रा में हिस्सा लिया और कैलाश मानसरोवर के दर्शन के बाद भारत वापसी की।
44 सदस्यीय आखिरी जत्था सुबह पहुंचा भारत
धारचूला आधार शिविर के प्रभारी धन सिंह बिष्ट ने बताया कि आखिरी जत्थे में कुल 44 सदस्य थे। इस जत्थे ने रविवार सुबह 9:20 बजे लिपुलेख दर्रा पार किया।
आखिरी जत्थे के भारत लौटने के साथ ही यात्रा के लिए निर्धारित सभी जत्थों की आवाजाही पूरी हो गई। इसके बाद इस वर्ष की यात्रा का समापन माना गया।
बारिश ने बदला यात्रा कार्यक्रम
उत्तराखंड के सीमावर्ती पहाड़ी इलाकों में बारिश के कारण इस बार यात्रा कार्यक्रम में भी बदलाव करना पड़ा। अधिकारियों के मुताबिक, लगातार बारिश के चलते सड़कों की स्थिति संवेदनशील बनी हुई थी।
यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आखिरी जत्थे को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बूंदी शिविर में रुकने के बजाय सीधे धारचूला लाया गया।
धारचूला आधार शिविर के प्रभारी धन सिंह बिष्ट के अनुसार, सामान्य कार्यक्रम के तहत यात्रियों को रविवार को बूंदी शिविर में विश्राम करना था, लेकिन बारिश के कारण सड़क की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए उन्हें सीधे धारचूला लाने का फैसला किया गया।
पांच जुलाई को शुरू हुई थी यात्रा
इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा की शुरुआत 5 जुलाई को हुई थी। इसके बाद अलग-अलग जत्थों में श्रद्धालुओं ने लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर की यात्रा की।
यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों के लिए उत्तराखंड का धारचूला महत्वपूर्ण आधार शिविर रहा। यहां से आगे की यात्रा के लिए प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की ओर से व्यवस्थाएं संचालित की गईं।
कठिन रास्तों के बीच आस्था का सफर
कैलाश मानसरोवर यात्रा केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी यात्रा नहीं है, बल्कि यह शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण सफर भी माना जाता है। ऊंचाई वाले इलाकों में कम ऑक्सीजन, दुर्गम पहाड़ी रास्ते और मौसम में अचानक बदलाव यात्रियों के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा करते हैं।
इसके बावजूद हर वर्ष श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और मानसरोवर के पवित्र जल में आस्था से जुड़ी धार्मिक परंपराओं को पूरा करने के लिए इस यात्रा पर निकलते हैं।
आखिरी जत्थे की वापसी के साथ खत्म हुआ यात्रा सत्र
रविवार को आखिरी जत्थे के भारत लौटने के साथ ही इस साल का कैलाश मानसरोवर यात्रा सत्र पूरा हो गया। कुल 477 श्रद्धालुओं ने इस वर्ष यात्रा में भाग लिया, जिनमें महिलाओं की संख्या भी उल्लेखनीय रही।
बारिश और सड़क की संवेदनशील परिस्थितियों के बीच प्रशासन ने यात्रियों की सुरक्षित वापसी को प्राथमिकता दी। इसी वजह से अंतिम जत्थे के निर्धारित विश्राम स्थल में बदलाव कर उसे सीधे धारचूला पहुंचाया गया।
कैलाश मानसरोवर यात्रा के समापन के साथ अब श्रद्धालुओं की इस साल की आध्यात्मिक यात्रा इतिहास का हिस्सा बन गई है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद यात्रा पूरी कर लौटे तीर्थयात्रियों के लिए यह सफर आस्था, साहस और हिमालयी अनुभवों से भरा रहा।
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