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नई दिल्ली: नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एस्सेल समूह के संस्थापक सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया (Personal Insolvency Resolution Process) के तहत पेश की गई ₹6.5 करोड़ की भुगतान योजना को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ लंबे समय से चल रही व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। हालांकि, मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले महज ₹6.5 करोड़ के भुगतान को लेकर हो रही है। यह अंतर करीब 99.97 प्रतिशत के हेयरकट के बराबर है।

NCLT का यह फैसला उस समय आया है जब चंद्र की भुगतान योजना को पहले ही लेनदारों की पर्याप्त मंजूरी मिल चुकी थी। नवंबर 2024 में हुई मतदान प्रक्रिया में योजना को 80.814 प्रतिशत वोट मिले थे। यह हिस्सा इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत जरूरी तीन-चौथाई समर्थन से अधिक था। हालांकि, कुछ बड़े वित्तीय संस्थानों ने योजना का विरोध किया था और इसके खिलाफ कई आपत्तियां भी उठाई थीं।

सुभाष चंद्र ने कहा- मैंने व्यक्तिगत तौर पर कर्ज नहीं लिया

NCLT के फैसले के बाद सुभाष चंद्र ने अपने बयान में इस पूरे मामले का संदर्भ स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ दर्ज किए गए बड़े दावे उस कर्ज के हैं, जिसे उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उधार नहीं लिया था। उनके मुताबिक, वे संबंधित कंपनियों के लिए पर्सनल गारंटर यानी व्यक्तिगत गारंटर थे।

चंद्र का कहना है कि जिन कंपनियों के कर्ज के लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, उन संस्थाओं ने करीब ₹45,000 करोड़ की देनदारी में से लगभग ₹43,000 करोड़ पहले ही चुका दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं ने बाकी रकम को भी चुकाने का आश्वासन दिया है।

चंद्र के मुताबिक, उनके द्वारा दी गई कुल व्यक्तिगत गारंटी लगभग ₹22,000 करोड़ की थी। व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में करीब ₹22,006 करोड़ के दावे दाखिल किए गए, जिनमें से लगभग ₹21,696 करोड़ के दावों को स्वीकार किया गया।

यही वजह है कि चंद्र की ओर से यह तर्क दिया गया है कि केवल व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया में दर्ज दावों को देखकर पूरे ऋण संकट की तस्वीर नहीं समझी जा सकती। उनके अनुसार, संबंधित कंपनियों द्वारा पहले ही बड़ी राशि का भुगतान किया जा चुका है।

₹6.5 करोड़ बनाम ₹22,006 करोड़ का मामला क्यों महत्वपूर्ण?

NCLT के फैसले की सबसे बड़ी चर्चा इसी अंतर को लेकर है। एक तरफ करीब ₹22,006.57 करोड़ के दावे हैं और दूसरी तरफ स्वीकृत भुगतान योजना के तहत केवल ₹6.5 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित है।

पहली नजर में यह लेनदारों के लिए बेहद बड़ा हेयरकट दिखाई देता है। हालांकि, बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े लोगों के मुताबिक इस मामले को केवल मौजूदा दावों की राशि के आधार पर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता। कई संबंधित ऋण काफी पुराने हैं और कुछ एक्सपोजर 10 से 13 वर्ष पुराने बताए जाते हैं।

एस्सेल समूह के कर्ज समाधान की प्रक्रिया 2019 में भी हुई थी। उस दौरान बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों ने विभिन्न माध्यमों से बड़ी रकम की वसूली की थी। इसमें गिरवी रखे गए Zee के शेयरों की बिक्री भी शामिल थी। इसके बाद कुछ मामलों में संबंधित ऋण खातों में बकाया राशि कम हुई या उन्हें राइट ऑफ किया गया।

हालांकि, उन ऋणों से जुड़ी सुभाष चंद्र की व्यक्तिगत गारंटी अलग से बनी रही और बाद में उसे व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया के माध्यम से लागू करने की कोशिश की गई। इसी वजह से मौजूदा प्रक्रिया में दिख रहा दावा और पुराने मूल ऋण की स्थिति एक जैसी नहीं है।

कुछ बैंकों को फिर भी हो सकता है वित्तीय लाभ

मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि कुछ लेनदारों के लिए ₹6.5 करोड़ की वसूली भले ही कुल दावों की तुलना में बेहद छोटी हो, लेकिन यह रकम उनके लिए अतिरिक्त रिकवरी के रूप में दर्ज हो सकती है।

उदाहरण के तौर पर, बैंकिंग सूत्रों के अनुसार HDFC से संबंधित व्यक्तिगत गारंटी का मामला बाद में HDFC Bank तक पहुंचा था, जबकि संबंधित मूल ऋण में बकाया राशि शून्य बताई गई थी। ऐसे मामले में व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर अब मिलने वाली रकम बैंक के लिए अतिरिक्त आय या लाभ के रूप में प्रभाव डाल सकती है।

इसलिए ₹6.5 करोड़ की राशि को केवल ₹22,000 करोड़ से तुलना करके देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि पुराने ऋणों के समाधान और राइट-ऑफ के बाद व्यक्तिगत गारंटी की वसूली किस स्थिति में पहुंची।

किन लेनदारों ने किया योजना का विरोध?

सुभाष चंद्र की भुगतान योजना को सभी लेनदारों का समर्थन नहीं मिला था। योजना का विरोध करने वालों में LIC Housing Finance, HDFC Bank, Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank, IDBI Trusteeship के माध्यम से Franklin Templeton Fund और Union Bank जैसे नाम शामिल थे।

चंद्र के बयान के अनुसार, विरोध करने वाले लेनदारों ने कुल करीब ₹3,992 करोड़ के दावे दाखिल किए थे। इनमें से लगभग ₹620 करोड़ के दावों का बाद में निपटारा हो चुका है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि संबंधित उधार लेने वाली संस्थाओं ने उन कई लेनदारों को करीब ₹1,113 करोड़ भुगतान करने की पेशकश की है, जिन्होंने योजना पर आपत्ति जताई थी।

इसका अर्थ यह है कि व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया में प्रस्तावित ₹6.5 करोड़ को लेकर चल रही बहस के साथ-साथ संबंधित कंपनियों की ओर से लेनदारों को किए जा रहे भुगतान और प्रस्तावों को भी अलग से समझना होगा।

NCLT ने क्यों मंजूर की योजना?

NCLT के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या कम भुगतान वाली इस योजना को कानून के तहत मंजूरी दी जा सकती है, खासकर तब जब कुछ लेनदार इसका विरोध कर रहे हों।

ट्रिब्यूनल ने माना कि मतदान में योजना को आवश्यक समर्थन हासिल हुआ था। नवंबर 2024 में योजना के पक्ष में 80.814 प्रतिशत वोट पड़े थे। IBC के तहत निर्धारित सीमा को देखते हुए यह पर्याप्त था।

NCLT ने यह भी कहा कि मंजूर की गई योजना उन लेनदारों पर भी बाध्यकारी होगी, जिन्होंने इसके खिलाफ मतदान किया था। इसका आधार IBC की संबंधित व्यवस्था है, जिसके तहत स्वीकृत समाधान योजना आवश्यक शर्तें पूरी करने के बाद सभी लेनदारों पर लागू होती है।

ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि विरोध करने वाले लेनदार योजना को अस्वीकार करके अधिक पैसा वसूल सकते थे। रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की ओर से उपलब्ध कराए गए मूल्यांकन के आधार पर NCLT ने माना कि सुभाष चंद्र की संपत्ति की वास्तविक कीमत इतनी नहीं थी कि लेनदारों को योजना को ठुकराने पर इससे ज्यादा वसूली हो सके।

दो सदस्यीय बेंच के बीच आया था मतभेद

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि NCLT की मूल दो सदस्यीय बेंच में सितंबर 2025 में फैसला एकमत नहीं था। 3 सितंबर 2025 को दोनों सदस्यों के बीच मतभेद सामने आया था।

इसके बाद फरवरी 2026 में NCLT के अध्यक्ष ने इस मतभेद को दूर करने के लिए मामले को तीसरे सदस्य के पास भेजा। तीसरे सदस्य के रूप में न्यायिक सदस्य निलेश शर्मा ने मामले की सुनवाई की और अपने आदेश के माध्यम से बहुमत की स्थिति स्पष्ट की।

शर्मा के आदेश ने अंततः भुगतान योजना को मंजूरी देने का रास्ता साफ किया।

हालांकि, योजना में एक संशोधन भी किया गया है। अनिल कुमार और सुनील जैन के माध्यम से 1,260 व्यक्तियों की ओर से दाखिल किए गए दावों को अंतिम लेनदार सूची से बाहर रखने का निर्देश दिया गया है। रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को निर्देश दिया गया है कि भुगतान की राशि को बाकी पात्र लेनदारों के बीच नियमों के अनुसार पुनर्वितरित किया जाए।

अब मामले को औपचारिक आदेश के लिए मूल दो सदस्यीय NCLT बेंच के पास वापस भेजा जाएगा।

सुभाष चंद्र की संपत्ति को लेकर भी उठे सवाल

इस मामले में लेनदारों की ओर से सुभाष चंद्र की संपत्ति और उनकी नेटवर्थ को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

बताया गया कि पूर्व वर्षों में पेश किए गए नेटवर्थ प्रमाणपत्रों में उनकी संपत्ति काफी अधिक दिखाई गई थी। 2017 में उनकी नेटवर्थ करीब ₹45,888 करोड़ और 2018 में करीब ₹40,562 करोड़ बताई गई थी। इसके मुकाबले वर्तमान प्रक्रिया में उनकी घोषित नेटवर्थ लगभग ₹31.79 करोड़ बताई गई।

लेनदारों की ओर से इस बड़े अंतर को लेकर सवाल उठाए गए और संपत्तियों की जांच के लिए फोरेंसिक ऑडिट जैसी मांगों पर भी जोर दिया गया।

हालांकि, NCLT ने कहा कि नेटवर्थ में भारी अंतर अपने आप में संपत्ति छिपाने या उसे दूसरी जगह ट्रांसफर करने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि IBC के तहत भुगतान योजना को मंजूरी देने के लिए फोरेंसिक ऑडिट हर मामले में अनिवार्य शर्त नहीं है।

2022 से चल रही है व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया

सुभाष चंद्र से जुड़ा यह मामला वर्ष 2022 में शुरू हुआ था। इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड ने IBC की धारा 95 के तहत व्यक्तिगत गारंटर के रूप में उनके खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवेदन किया था।

इसके बाद मामला कानूनी चुनौतियों और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े अंतरिम आदेशों के कारण आगे बढ़ने में समय लेता रहा। बाद में रोक हटने के बाद अप्रैल 2024 में NCLT ने सुभाष चंद्र को व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में शामिल कर लिया।

इसके बाद उनकी ओर से भुगतान योजना पेश की गई, जिसे लेनदारों के बीच मतदान के लिए रखा गया। पर्याप्त वोट मिलने के बावजूद विरोध करने वाले लेनदारों ने योजना को विभिन्न आधारों पर चुनौती दी।

अब NCLT के ताजा आदेश के बाद इस विवाद का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है।

विजय माल्या ने भी दी प्रतिक्रिया

NCLT के फैसले पर कारोबारी विजय माल्या ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया दी। माल्या ने सुभाष चंद्र को बधाई देते हुए अपने मामले से इसकी तुलना की।

माल्या ने दावा किया कि बैंकों और सरकार ने उनसे करीब ₹14,100 करोड़ की वसूली की है, जबकि उनके खिलाफ फैसला करीब ₹6,203 करोड़ की देनदारी को लेकर था। उन्होंने अलग-अलग कारोबारी मामलों में ऋण समाधान और वसूली के तरीकों को लेकर सवाल उठाया।

विजय माल्या मार्च 2016 में भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए थे। इसके बाद किंगफिशर एयरलाइंस से जुड़े कर्ज को लेकर भारतीय बैंकों और एजेंसियों की कार्रवाई जारी रही।

आगे क्या होगा?

NCLT की मंजूरी के बाद सुभाष चंद्र की भुगतान योजना को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हालांकि, मामले की कानूनी यात्रा पूरी तरह समाप्त हुई है या नहीं, यह आगे होने वाली प्रक्रियाओं और संभावित कानूनी चुनौतियों पर निर्भर करेगा।

फिलहाल इस आदेश का सबसे बड़ा संदेश यह है कि व्यक्तिगत गारंटी के मामलों में किसी कारोबारी की व्यक्तिगत देनदारी और उस कंपनी के मूल कर्ज के बीच अंतर को समझना बेहद जरूरी है। सुभाष चंद्र का पक्ष है कि वे स्वयं उधारकर्ता नहीं थे, बल्कि संबंधित कंपनियों के व्यक्तिगत गारंटर थे और उन कंपनियों ने बड़ी मात्रा में कर्ज पहले ही चुका दिया है।

दूसरी ओर, लेनदारों के लिए यह मामला इस सवाल को सामने लाता है कि व्यक्तिगत गारंटी लागू होने के बाद वास्तविक वसूली कितनी हो सकती है और दिवाला प्रक्रिया में उपलब्ध संपत्ति के आधार पर लेनदारों को किस सीमा तक भुगतान मिल सकता है।

₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले ₹6.5 करोड़ का भुगतान निश्चित तौर पर असाधारण अंतर दिखाता है। लेकिन पुराने ऋणों की वसूली, राइट-ऑफ, गिरवी रखी संपत्तियों की बिक्री और व्यक्तिगत गारंटी की अलग कानूनी स्थिति को देखते हुए इस मामले की पूरी तस्वीर कहीं अधिक जटिल है।

NCLT का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह व्यक्तिगत गारंटरों के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया, लेनदारों के अधिकार और पहले से हो चुकी कॉरपोरेट ऋण वसूली के बीच संबंध को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

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