लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सड़क बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में शामिल गंगा एक्सप्रेसवे एक बार फिर बारिश के बाद सामने आई तस्वीरों और सड़क पर हुए जलभराव को लेकर चर्चा में है। करीब 594 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे की लागत लगभग ₹36,230 करोड़ बताई गई है। अप्रैल 2026 में इसका उद्घाटन भी हो चुका है। लेकिन मानसून के दौरान उन्नाव समेत कुछ हिस्सों में जलभराव, मिट्टी कटने और सड़क के कुछ हिस्सों में क्षति की घटनाओं ने इसके ड्रेनेज और निर्माण की मजबूती को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में इसे लेकर तंज भी सामने आया कि “36 हजार करोड़ का एक्सप्रेसवे बारिश में स्विमिंग पूल बन गया।” हालांकि इस टिप्पणी को तथ्य के तौर पर नहीं, बल्कि जलभराव को लेकर की जा रही आलोचना के रूप में देखना चाहिए।
उन्नाव में सितंबर की शुरुआत में गंगा एक्सप्रेसवे के टोल प्लाजा और सर्विस लेन के आसपास भारी जलभराव की खबर सामने आई थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 100 मीटर तक सर्विस लेन पर पानी जमा हो गया था और कुछ स्थानों पर पानी घुटनों से ऊपर तक पहुंच गया था। इसके बाद सड़क के एक हिस्से में गड्ढे बनने की भी सूचना सामने आई।
36 हजार करोड़ की परियोजना, फिर बारिश में क्यों दिखी परेशानी?
गंगा एक्सप्रेसवे को उत्तर प्रदेश की पश्चिमी और पूर्वी पट्टी को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण हाई-स्पीड कॉरिडोर के रूप में विकसित किया गया है। उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी UPEIDA के अनुसार इसकी लंबाई लगभग 594 किलोमीटर है और यह छह लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे है, जिसे भविष्य में आठ लेन तक विस्तारित किया जा सकता है। यह मेरठ से प्रयागराज तक 12 जिलों से होकर गुजरता है।
केंद्र सरकार की ओर से अप्रैल 2026 में जारी जानकारी में परियोजना की कुल लागत लगभग ₹36,230 करोड़ बताई गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अप्रैल 2026 को हरदोई में इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया था।
इतनी बड़ी लागत और इतने बड़े पैमाने की परियोजना होने के कारण स्वाभाविक है कि बारिश के दौरान सामने आने वाली किसी भी तकनीकी समस्या पर लोगों की नजर जाए।
सवाल यह नहीं है कि बारिश में सड़क पर पानी क्यों आया।
सवाल यह है कि इतने बड़े एक्सप्रेसवे के डिजाइन में जल निकासी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है और लगातार बारिश की स्थिति में वह व्यवस्था कितना दबाव झेल सकती है?
उन्नाव में जलभराव के बाद सड़क पर बने गड्ढे
सितंबर की शुरुआत में उन्नाव के दही चौकी क्षेत्र के आसपास गंगा एक्सप्रेसवे पर बारिश से जुड़ी समस्या सामने आई। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार करीब किलोमीटर 420 के आसपास सोनिक स्थित टोल लेन और सर्विस लेन में जलभराव हुआ। इसके बाद किलोमीटर 423.6 के आसपास मुख्य मार्ग के एक हिस्से में दो गड्ढे भी पाए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से एक गड्ढे की गहराई पांच मीटर से अधिक और दूसरे की भी करीब पांच मीटर बताई गई। संबंधित एजेंसी ने बाद में इन स्थानों पर मरम्मत का काम किया।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गंगा एक्सप्रेसवे को अभी बहुत पुरानी सड़क नहीं माना जा सकता। ऐसे में बारिश के दौरान सड़क या उसके आसपास की संरचना में नुकसान की खबर सामने आना स्वाभाविक रूप से इंजीनियरिंग, जल निकासी और रखरखाव को लेकर सवाल पैदा करता है।
पहले भी सामने आई थी सड़क धंसने की घटना
यह पहली बार नहीं था जब गंगा एक्सप्रेसवे पर बारिश के बाद समस्या सामने आई हो।
अगस्त 2026 में भी उन्नाव के आसपास एक्सप्रेसवे के एक हिस्से में बारिश के बाद सड़क के किनारे की मिट्टी बहने और सड़क धंसने की सूचना सामने आई थी। एक रिपोर्ट में किलोमीटर 421 से 422 के बीच सराय कटियां नहर पुल के पास सड़क के हिस्से में धंसाव का उल्लेख किया गया था।
इससे पहले जुलाई में भी उन्नाव में सोनिक टोल प्लाजा को जोड़ने वाली लिंक रोड का एक हिस्सा बारिश के बाद क्षतिग्रस्त होने की खबर आई थी। रिपोर्ट के अनुसार सड़क के नीचे की मिट्टी बहने के बाद करीब सात मीटर लंबे हिस्से में समस्या सामने आई थी।
अगस्त में तो गंगा एक्सप्रेसवे पर भारी बारिश के बाद करीब 10 मीटर गहरे गड्ढे की खबर भी सामने आई थी। उस समय भी निर्माण की गुणवत्ता और ड्रेनेज व्यवस्था को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि उस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया था कि क्षति का वास्तविक कारण और उसमें किसी निर्माण संबंधी कमी की भूमिका जांच के बाद ही तय की जा सकती है।
क्या यह निर्माण की कमी है या अत्यधिक बारिश का असर?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
किसी सड़क पर बारिश के बाद पानी जमा होना या मिट्टी का कटाव दिखाई देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि निर्माण खराब था।
इसके लिए तकनीकी जांच जरूरी है।
गंगा एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों में सामने आई समस्याओं को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग संभावित कारण बताए गए हैं। एक तकनीकी आकलन का हवाला देते हुए सितंबर की एक रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ स्थानों पर दिखाई दिए ‘रेन कट’ अत्यधिक और लगातार बारिश के कारण हुए सतही कटाव से जुड़े हो सकते हैं और नए बने तटबंधों के पहले मानसून में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों ने जल निकासी और मिट्टी के पर्याप्त कंपेक्शन जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए हैं।
इसलिए अंतिम निष्कर्ष तकनीकी जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
अडानी समूह की भूमिका क्या है?
गंगा एक्सप्रेसवे को चार पैकेज में PPP यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत विकसित किया गया। UPEIDA के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार चार समूहों में से ग्रुप-II, ग्रुप-III और ग्रुप-IV के लिए अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड चयनित बोलीदाता था, जबकि ग्रुप-I के लिए IRB Infrastructure Developers को चुना गया था। इन चारों समूहों के लिए कुल ग्रांट ₹7,742 करोड़ दर्ज है।
अडानी एंटरप्राइजेज ने अपने आधिकारिक बयान में बताया था कि उसे गंगा एक्सप्रेसवे के तीन हिस्सों—बदायूं से हरदोई, हरदोई से उन्नाव और उन्नाव से प्रयागराज—के विकास के लिए Letter of Award मिला था। कंपनी के अनुसार इन तीन हिस्सों की कुल लंबाई 464 किलोमीटर थी और परियोजना DBFOT यानी Design, Build, Finance, Operate and Transfer मॉडल पर थी।
इसलिए यह कहना कि पूरा 594 किलोमीटर गंगा एक्सप्रेसवे केवल अडानी ने बनाया, सही तस्वीर नहीं देता। परियोजना के तीन प्रमुख पैकेज अडानी एंटरप्राइजेज से जुड़े थे, जबकि एक पैकेज अन्य कंपनी को दिया गया था।
‘स्विमिंग पूल’ वाली तस्वीर क्यों बनी चर्चा का विषय?
सितंबर की शुरुआत में उन्नाव में जलभराव की तस्वीरों और वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर ‘स्विमिंग पूल’ जैसी टिप्पणियां तेजी से चर्चा में आईं।
एक मीडिया रिपोर्ट में भी उन्नाव के पास टोल प्लाजा और सर्विस लेन पर जलभराव को ‘स्विमिंग पूल’ के रूप में वर्णित किया गया। पानी निकालने के लिए पंपिंग सेट लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई।
यही तस्वीरें अब बड़े सवाल में बदल रही हैं।
क्योंकि जब करोड़ों रुपये की लागत से कोई हाई-स्पीड एक्सेस-कंट्रोल्ड सड़क बनाई जाती है, तो लोगों की अपेक्षा होती है कि वह सिर्फ सामान्य मौसम में ही नहीं, बल्कि भारी बारिश जैसी परिस्थितियों में भी सुरक्षित और उपयोगी बनी रहे।
एक्सप्रेसवे का उद्देश्य क्या था?
गंगा एक्सप्रेसवे का उद्देश्य केवल एक सड़क बनाना नहीं था।
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक यह मेरठ से प्रयागराज तक पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाला लगभग 594 किलोमीटर लंबा हाई-स्पीड कॉरिडोर है। छह लेन की इस सड़क को आठ लेन तक विस्तार योग्य बनाया गया है।
केंद्र सरकार के अनुसार इससे मेरठ और प्रयागराज के बीच यात्रा का समय करीब 10-12 घंटे से घटकर लगभग छह घंटे तक आने की उम्मीद है। परियोजना को औद्योगिक विकास, व्यापार, कृषि और पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
ऐसे में एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता और दीर्घकालिक रखरखाव केवल सड़क विभाग का विषय नहीं रह जाता। इसका सीधा संबंध यात्रियों की सुरक्षा और राज्य की आर्थिक गतिविधियों से भी है।
अब सबसे बड़ा सवाल—जांच कौन करेगा?
बारिश से हुए नुकसान की मरम्मत करना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है यह पता लगाना कि नुकसान हुआ क्यों।
क्या किसी स्थान पर जल निकासी की क्षमता कम थी?
क्या बारिश का पानी निर्धारित रास्ते से नहीं निकल पाया?
क्या सड़क के किनारे की मिट्टी की सुरक्षा पर्याप्त थी?
क्या तटबंध का कंपेक्शन मानकों के अनुरूप था?
क्या डिजाइन में स्थानीय वर्षा और जल निकासी की परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखा गया था?
या फिर यह असाधारण बारिश के कारण हुई ऐसी क्षति है, जिसे किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में मरम्मत के जरिए ठीक किया जा सकता है?
इन सवालों का जवाब भावनाओं या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि स्वतंत्र तकनीकी जांच और सार्वजनिक रिपोर्ट से मिलना चाहिए।
सरकार और निर्माण एजेंसी दोनों के सामने जवाबदेही का सवाल
अगर तकनीकी जांच में यह पाया जाता है कि जल निकासी, डिजाइन, निर्माण सामग्री या तटबंध निर्माण में कोई कमी थी, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अगर जांच में यह सामने आता है कि अत्यधिक बारिश के कारण सामान्य से अधिक दबाव पड़ा और संरचना के कुछ हिस्सों में स्थानीय स्तर पर क्षति हुई, तो यह भी सार्वजनिक रूप से बताया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
क्योंकि जनता का सवाल सीधा है—
₹36 हजार करोड़ की परियोजना पर खर्च के बाद अगर पहली ही बारिशों में जलभराव, सड़क धंसने और गड्ढों जैसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो इसकी स्थायी रोकथाम की योजना क्या है?
केवल मरम्मत नहीं, स्थायी समाधान चाहिए
किसी सड़क पर गड्ढा बन गया और उसे भर दिया गया—यह तत्काल समाधान हो सकता है।
लेकिन अगर उसी स्थान पर अगली बारिश में फिर पानी जमा हो जाए तो समस्या वहीं की वहीं रहेगी।
इसलिए जरूरत केवल पैचवर्क की नहीं है।
जरूरत है पूरे प्रभावित हिस्से की तकनीकी जांच की।
ड्रेनेज सिस्टम की क्षमता जांचने की।
तटबंधों की मजबूती देखने की।
मिट्टी की गुणवत्ता और कंपेक्शन की जांच करने की।
जहां जरूरी हो वहां अतिरिक्त जल निकासी व्यवस्था विकसित करने की।
और मानसून के दौरान लगातार पेट्रोलिंग तथा निगरानी की।
जनता के पैसे और सुरक्षा दोनों का सवाल
गंगा एक्सप्रेसवे की कुल परियोजना लागत करीब ₹36,230 करोड़ बताई गई है। यह कोई छोटी सड़क परियोजना नहीं है। यह उत्तर प्रदेश के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल है।
इसलिए इसके हर हिस्से की गुणवत्ता पर सवाल उठने पर जवाब भी उसी स्तर की गंभीरता से मिलना चाहिए।
लोगों को यह जानने का अधिकार है कि जलभराव क्यों हुआ।
सड़क क्यों धंसी।
गड्ढे कैसे बने।
ड्रेनेज सिस्टम ने उस स्थिति में कैसे काम किया।
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भविष्य में ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी?
गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर ‘स्विमिंग पूल’ वाली टिप्पणी भले ही राजनीतिक या सोशल मीडिया की भाषा हो, लेकिन उसके पीछे दिखाई दे रही जलभराव और सड़क क्षति की तस्वीरें तकनीकी जांच की जरूरत जरूर दिखाती हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में कुछ स्थानों पर नुकसान की पुष्टि और मरम्मत की जानकारी सामने आई है, जबकि नुकसान के मूल कारण को लेकर अलग-अलग आकलन हैं।
अब असली परीक्षा यह है कि संबंधित एजेंसियां इन घटनाओं को केवल अस्थायी मरम्मत तक सीमित रखती हैं या फिर कारणों की पहचान कर ऐसी व्यवस्था बनाती हैं जिससे अगली भारी बारिश में गंगा एक्सप्रेसवे पर वही तस्वीर दोबारा देखने को न मिले।
नई सोच नई ऊर्जा की यह रिपोर्ट उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और हालिया सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। निर्माण में किसी दोष या लापरवाही का अंतिम निष्कर्ष तकनीकी जांच के बिना नहीं निकाला जाना चाहिए।
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