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OBC कांग्रेस ने केंद्र सरकार के सामने 4 अक्टूबर तक का अल्टीमेटम रखा; जातिगत आंकड़ों के साथ पंचायत, आरक्षण, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठाए

लखनऊ, 22 सितंबर 2026। जनगणना-2027 में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की स्पष्ट पहचान और जातिवार आंकड़ों को लेकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पिछड़ा वर्ग विभाग ने जनगणना में OBC के लिए अलग कॉलम उपलब्ध कराने, प्रगणकों को जातियों की व्यवस्थित ड्रॉप-डाउन सूची देने और OBC वर्ग की सुरक्षा के लिए अलग अत्याचार निवारण कानून बनाने की मांग उठाई है। संगठन ने इन मांगों को लेकर 4 अक्टूबर 2026 तक का अल्टीमेटम देने और मांगें पूरी न होने की स्थिति में 5 अक्टूबर को लखनऊ में राजभवन घेराव करने का ऐलान किया है।

यह घोषणा OBC कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मनोज यादव की ओर से जारी किए गए 22 सितंबर के बयान में की गई है। संगठन ने कहा है कि वह जनगणना-2027 को केवल जनसंख्या की गणना तक सीमित रखने के बजाय जातिगत सामाजिक स्थिति, प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी से जुड़े सवालों के संदर्भ में देख रहा है।

हालांकि, जनगणना को लेकर केंद्र सरकार की मौजूदा आधिकारिक स्थिति यह है कि 2027 की जनगणना में जातियों की गणना शामिल की गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 30 अप्रैल 2025 को आगामी जनगणना में जाति-गणना को शामिल करने का निर्णय घोषित किया था। बाद में 14 अगस्त 2026 को जनसंख्या गणना के दूसरे चरण के लिए 40 सवालों वाली प्रश्नावली अधिसूचित की गई, जिसमें सवाल नंबर 10 में “अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST)/जाति” का प्रावधान है।

OBC कांग्रेस की मांग क्या है?

मनोज यादव के बयान के अनुसार OBC कांग्रेस की मुख्य मांग यह है कि जनगणना के दौरान अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान और संख्या को स्पष्ट रूप से दर्ज करने के लिए अलग OBC कॉलम रखा जाए।

इसके साथ ही संगठन चाहता है कि प्रगणकों को पहले से तैयार जातियों की ड्रॉप-डाउन सूची उपलब्ध कराई जाए। संगठन का तर्क है कि यदि गणना के दौरान व्यक्ति अपनी जाति या उपजाति स्वयं बताता है और उसे खुले विकल्प के रूप में दर्ज किया जाता है, तो अलग-अलग नामों, वर्तनी या उपजातीय पहचान के कारण आंकड़ों के वर्गीकरण में कठिनाई पैदा हो सकती है।

यह मुद्दा केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। अगस्त 2026 में कांग्रेस ने भी जनगणना की प्रश्नावली में जाति दर्ज करने की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए सूचीबद्ध विकल्प उपलब्ध कराने की मांग की थी। कांग्रेस नेताओं ने कहा था कि जातियों के नाम दर्ज करने के लिए व्यवस्थित सूची होने से आंकड़ों के संकलन और वर्गीकरण में अधिक एकरूपता लाई जा सकती है।

केंद्र की अधिसूचना में क्या है?

जनगणना-2027 को लेकर तस्वीर का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से जनगणना में जाति-गणना शामिल करने का निर्णय लिया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार दूसरे चरण यानी Population Enumeration में प्रत्येक व्यक्ति से सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, प्रवास और अन्य विवरणों के साथ जाति संबंधी जानकारी भी ली जाएगी।

14 अगस्त 2026 की अधिसूचना में कुल 40 प्रश्नों को शामिल किया गया। इनमें दसवां प्रश्न SC/ST/जाति से संबंधित है। उपलब्ध अधिसूचना के अनुसार गैर-SC/ST व्यक्तियों के लिए जाति का विवरण दर्ज करने की व्यवस्था है। इस प्रश्न में किसी OBC श्रेणी के लिए अलग से “OBC” नाम वाला पृथक कॉलम नहीं दिखाई देता। इसी बिंदु को लेकर कांग्रेस और उसके OBC विभाग ने आपत्ति दर्ज की है।

यानी विवाद का केंद्र यह नहीं है कि जनगणना में जाति पूछी जाएगी या नहीं—केंद्र ने जाति-गणना का निर्णय पहले ही लिया है। मौजूदा राजनीतिक बहस इस बात पर है कि जाति संबंधी जानकारी किस प्रारूप, वर्गीकरण और डेटा-प्रसंस्करण व्यवस्था के जरिए दर्ज की जाएगी।

बिहार और तेलंगाना के मॉडल का हवाला

OBC कांग्रेस ने अपने बयान में बिहार और तेलंगाना में हुए जातिगत सर्वेक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक और व्यवस्थित बनाया जाना चाहिए।

कांग्रेस नेतृत्व पहले भी तेलंगाना के जाति सर्वेक्षण को राष्ट्रीय जाति-गणना के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ के तौर पर प्रस्तुत करता रहा है। कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित एक बयान में राहुल गांधी ने तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण को राष्ट्रीय स्तर की जाति-गणना के लिए महत्वपूर्ण मॉडल बताया था।

कांग्रेस ने बिहार के जातिगत सर्वेक्षण का भी कई मौकों पर उल्लेख किया है। पार्टी का तर्क रहा है कि जातिगत आंकड़ों के आधार पर सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने तथा नीतियों को अधिक लक्षित बनाने में मदद मिल सकती है।

OBC कांग्रेस का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी जातिवार आंकड़ों की सटीकता महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इन्हीं आंकड़ों के आधार पर भविष्य में सामाजिक प्रतिनिधित्व, सरकारी योजनाओं और विभिन्न वर्गों की भागीदारी को लेकर बहस आगे बढ़ सकती है।

आरक्षण और हिस्सेदारी का सवाल भी जोड़ा

मनोज यादव के बयान में जनगणना को OBC वर्ग के आरक्षण, सरकारी नौकरियों और संसाधनों में हिस्सेदारी से भी जोड़ा गया है। OBC कांग्रेस का कहना है कि जब तक अलग-अलग सामाजिक समूहों की आबादी का विश्वसनीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं होगा, तब तक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी पर होने वाली बहस में तथ्यात्मक आधार की कमी बनी रह सकती है।

कांग्रेस लंबे समय से जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ती रही है। कांग्रेस कार्यसमिति ने मई 2025 में जातिगत जनगणना पर प्रस्ताव पारित करते हुए जातिवार आबादी के आंकड़े जुटाने की मांग का समर्थन किया था।

राहुल गांधी भी जातिगत जनगणना को प्रतिनिधित्व और सामाजिक-आर्थिक नीतियों से जोड़कर अपनी बात रखते रहे हैं। हालांकि, जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर आरक्षण या अन्य नीतिगत बदलाव अपने आप लागू नहीं हो जाते; उनके लिए संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएं अलग होती हैं।

OBC सुरक्षा के लिए अलग कानून की मांग

OBC कांग्रेस ने जनगणना के मुद्दे के साथ सामाजिक सुरक्षा का एक दूसरा बड़ा सवाल भी उठाया है। संगठन ने मांग की है कि OBC समुदाय के लिए SC-ST अत्याचार निवारण अधिनियम की तरह अलग OBC अत्याचार निवारण कानून बनाया जाए।

मनोज यादव के अनुसार, OBC समुदाय से जुड़े लोगों के खिलाफ होने वाली हिंसा और कथित भेदभाव के मामलों को देखते हुए एक विशेष कानूनी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है। उनका कहना है कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों की सुरक्षा केवल आंकड़ों तक सीमित विषय नहीं हो सकती।

यह मांग कांग्रेस के व्यापक OBC एजेंडे के साथ भी जुड़ती दिखाई दे रही है। सितंबर 2026 में कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश में अतिपिछड़े वर्गों के लिए विशेष कानूनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा सामने आई है। मीडिया रिपोर्टों में इसे बिहार के अनुभव से जोड़कर बताया गया है।

हालांकि, प्रस्तावित OBC अत्याचार निवारण कानून की वास्तविक कानूनी रूपरेखा, इसमें शामिल अपराधों और दंडात्मक प्रावधानों को लेकर इस बयान में विस्तृत मसौदा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

4 अक्टूबर तक का अल्टीमेटम

OBC कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मनोज यादव ने अपने बयान में केंद्र सरकार से जनगणना-2027 में OBC कॉलम और जातियों की ड्रॉप-डाउन सूची से जुड़ी मांगों पर कार्रवाई करने के लिए 4 अक्टूबर 2026 तक की समयसीमा तय की है।

बयान के मुताबिक, यदि इस अवधि तक मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाया जाता है तो 5 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश के OBC समाज की ओर से राजभवन घेराव किया जाएगा।

इस प्रस्तावित कार्यक्रम का केंद्र लखनऊ रहेगा। संगठन की ओर से इसे प्रदेशव्यापी OBC आंदोलन के अगले चरण के तौर पर पेश किया गया है।

पहले भी जिलों में उठ चुका है मुद्दा

OBC कांग्रेस की ओर से यह मुद्दा सितंबर में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में भी उठाया गया है। 14 सितंबर को उरई में कांग्रेस OBC मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने जनगणना फॉर्म में OBC कॉलम और ड्रॉप-डाउन सूची की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। इसी तरह बदायूं में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा था।

इन प्रदर्शनों में कांग्रेस नेताओं ने जाति दर्ज करने के खुले प्रारूप पर सवाल उठाते हुए पहले से निर्धारित सूची की मांग की थी। इस तरह लखनऊ में प्रस्तावित राजभवन घेराव को जिला स्तर पर चलाए गए अभियानों के आगे के चरण के रूप में देखा जा सकता है।

जनगणना प्रक्रिया अब किस चरण में है?

केंद्र सरकार की आधिकारिक योजना के मुताबिक Census 2027 दो चरणों में होगी। पहला चरण हाउस लिस्टिंग एवं हाउसिंग सेंसस है, जबकि दूसरा चरण Population Enumeration होगा। सामान्य क्षेत्रों में जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में प्रस्तावित है।

उत्तर प्रदेश के लिए भी सितंबर 2026 में जनगणना-2027 से संबंधित अधिसूचना जारी की जा चुकी है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय के रिकॉर्ड में 5 सितंबर 2026 की अधिसूचना उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों में Population Enumeration के संचालन से संबंधित है।

ऐसे में जनगणना की प्रश्नावली और उसके जरिए जाति संबंधी सूचना दर्ज करने की व्यवस्था को लेकर उठी राजनीतिक मांग अब सीधे उस प्रक्रिया से जुड़ गई है, जिसकी तैयारी केंद्र और राज्यों के स्तर पर चल रही है।

राजनीतिक टकराव के बीच आगे की नजर

जातिगत जनगणना का मुद्दा आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है। एक तरफ केंद्र सरकार ने Census 2027 में जाति-गणना शामिल करने का निर्णय ले लिया है, वहीं कांग्रेस और OBC संगठन अब इसकी पद्धति, वर्गीकरण और डेटा की उपयोगिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

OBC कांग्रेस का कहना है कि केवल जाति का नाम दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। संगठन चाहता है कि ऐसी व्यवस्था बने जिसमें जातियों का वर्गीकरण व्यवस्थित हो, आंकड़ों की विश्वसनीयता बनी रहे और बाद में इन आंकड़ों के आधार पर सामाजिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा की जा सके।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार की अधिसूचना में जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने का प्रावधान पहले ही शामिल है और सरकार इसे आगामी जनगणना की एक महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार Census 2027 में पहली बार डिजिटल माध्यम से व्यापक जाति-गणना की जाएगी और डेटा संग्रह के लिए मोबाइल आधारित व्यवस्था तथा निगरानी तंत्र का इस्तेमाल किया जाएगा।

अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि 4 अक्टूबर की समयसीमा से पहले OBC कांग्रेस की मांगों पर केंद्र या राज्य सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं। यदि संगठन अपने घोषित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ता है तो 5 अक्टूबर का राजभवन घेराव उत्तर प्रदेश में जातिगत जनगणना को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को सड़क पर भी ले जा सकता है।

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