लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जिसमें विश्वविद्यालय के विधि विभाग के डीन डॉ. आर.के. वर्मा पर कथित तौर पर अभद्र एवं धमकी भरे व्यवहार का आरोप लगाया गया है। विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. किशोरी लाल ने इस मामले में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं लखनऊ विश्वविद्यालय की कुलाधिपति को लिखित प्रत्यावेदन भेजकर घटना की स्वतंत्र जांच कराए जाने की मांग की है।
प्रत्यावेदन में 10 सितंबर को विधि संकाय में हुई कथित घटना का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि डॉ. किशोरी लाल अपनी शोधार्थी बेटी से संबंधित पीएचडी दस्तावेज जमा कराने के सिलसिले में विधि संकाय पहुंचे थे। इसी दौरान परीक्षा कक्ष में डॉ. आर.के. वर्मा के साथ कथित तौर पर उनकी बातचीत हुई। आरोप है कि इस दौरान उनके साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया और उनकी बेटी की पीएचडी डिग्री को लेकर भी टिप्पणी की गई।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। ऐसे में पूरे मामले में संबंधित पक्षों के बयान और उपलब्ध रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
10 सितंबर की घटना को लेकर उठे सवाल
डॉ. किशोरी लाल की ओर से दिए गए प्रत्यावेदन के अनुसार, 10 सितंबर को वह अपनी बेटी से संबंधित पीएचडी प्रक्रिया के दस्तावेज जमा कराने के उद्देश्य से विधि संकाय पहुंचे थे। इसी दौरान परीक्षा कक्ष में कथित तौर पर उनके और डॉ. आर.के. वर्मा के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि डॉ. आर.के. वर्मा ने उनके साथ कथित तौर पर गाली-गलौज एवं अभद्र भाषा का प्रयोग किया। शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया है कि बातचीत के दौरान उनकी बेटी की पीएचडी डिग्री से संबंधित टिप्पणी की गई।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि शिकायतकर्ता के अनुसार उनकी बेटी विधि विषय में पीएचडी कर रही हैं और उनकी शैक्षणिक प्रक्रिया अभी पूरी होनी बाकी है। इसी वजह से शिकायत में पीएचडी से संबंधित आगे की प्रक्रिया को किसी भी प्रकार के दबाव, पक्षपात अथवा प्रतिशोध से मुक्त रखने की मांग की गई है।
स्वतंत्र जांच की मांग
डॉ. किशोरी लाल ने राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति को भेजे अपने प्रत्यावेदन में पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि घटना की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए केवल शिकायतकर्ता या आरोपी पक्ष का बयान पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उस समय मौके पर मौजूद लोगों के बयान भी लिए जाने चाहिए।
शिकायत में परीक्षा के दौरान मौजूद invigilators, supervisors और अन्य संबंधित व्यक्तियों से जानकारी लेने की मांग की गई है। इसके अलावा अनुराग श्रीवास्तव, प्रेम चंद यादव, श्री चौहान सहित उन लोगों के बयान दर्ज किए जाने की मांग की गई है, जो कथित घटना के समय वहां मौजूद थे।
परीक्षा कक्ष में मौजूद परीक्षार्थियों से भी जानकारी लिए जाने की मांग की गई है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि घटनास्थल पर वास्तव में क्या हुआ था और बातचीत किस परिस्थिति में हुई।
परीक्षा कक्ष में मौजूद लोगों के बयान क्यों महत्वपूर्ण?
इस पूरे मामले में सबसे अहम पहलू प्रत्यक्षदर्शियों के बयान हो सकते हैं। यदि किसी विवाद के दौरान कई लोग मौके पर मौजूद थे, तो उनके स्वतंत्र बयान घटना की परिस्थितियों को समझने में मदद कर सकते हैं।
शिकायतकर्ता की ओर से इसी आधार पर मांग की गई है कि उस समय परीक्षा कक्ष में मौजूद परीक्षार्थियों, निरीक्षकों और पर्यवेक्षकों से भी तथ्यात्मक जानकारी ली जाए।
इसके अलावा यदि विश्वविद्यालय के पास उस समय की कोई प्रशासनिक रिपोर्ट, परीक्षा संबंधी रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज अथवा अन्य दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो जांच के दौरान उनका भी परीक्षण किया जा सकता है। इससे किसी एक पक्ष के दावे पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम को समझने में मदद मिलेगी।
डॉ. आर.के. वर्मा पर कार्रवाई की मांग
प्रत्यावेदन में शिकायतकर्ता ने जांच के निष्कर्षों के आधार पर डॉ. आर.के. वर्मा के खिलाफ आवश्यक अनुशासनात्मक एवं प्रशासनिक कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
यह मांग इस शर्त के साथ रखी गई है कि पहले पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और संबंधित सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। यानी शिकायत में लगाए गए आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष या कार्रवाई तक पहुंचने की मांग की गई है।
विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान में विभागीय अधिकारियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के बीच संवाद का तरीका महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी के व्यवहार को लेकर औपचारिक शिकायत सामने आती है, तो शिकायतकर्ता के अनुसार उसकी निष्पक्ष जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
बेटी की पीएचडी प्रक्रिया को लेकर भी चिंता
शिकायत में सबसे महत्वपूर्ण मांगों में से एक डॉ. किशोरी लाल की बेटी की पीएचडी प्रक्रिया को लेकर है। शिकायतकर्ता ने आशंका जताई है कि विवाद का असर उनकी बेटी की शैक्षणिक प्रक्रिया पर नहीं पड़ना चाहिए।
इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मांग की है कि उनकी बेटी की पीएचडी थीसिस के मूल्यांकन, viva-voce और डिग्री प्रदान किए जाने की पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से संचालित करने के लिए स्पष्ट प्रशासनिक निर्देश जारी किए जाएं।
शिकायतकर्ता की मांग है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी प्रकार का दबाव, प्रतिशोध या व्यक्तिगत विवाद प्रभावी न हो। उनका कहना है कि उनके और किसी अधिकारी के बीच यदि कोई विवाद है तो उसका असर शोधार्थी की शैक्षणिक प्रगति पर नहीं पड़ना चाहिए।
शिकायत में कई प्रत्यक्षदर्शियों के नाम
शिकायत में घटना के समय मौजूद बताए गए कुछ लोगों के नाम भी सामने रखे गए हैं। इनमें अनुराग श्रीवास्तव, प्रेम चंद यादव और श्री चौहान सहित परीक्षा कक्ष में मौजूद अन्य लोग शामिल बताए गए हैं।
शिकायतकर्ता का जोर इस बात पर है कि संबंधित लोगों के बयान दर्ज कर घटना की परिस्थितियों की पुष्टि की जाए। इसके साथ ही परीक्षा कक्ष में मौजूद परीक्षार्थियों से भी जानकारी लेने की मांग की गई है।
यदि विश्वविद्यालय स्तर पर जांच समिति गठित की जाती है, तो वह संबंधित व्यक्तियों के बयान, दस्तावेज और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की जांच कर सकती है।
कुलाधिपति को 11 सितंबर को भेजा गया प्रत्यावेदन
जानकारी के अनुसार, डॉ. किशोरी लाल ने इस मामले को लेकर 11 सितंबर को राज्यपाल एवं लखनऊ विश्वविद्यालय की कुलाधिपति को प्रत्यावेदन भेजा। इसमें 10 सितंबर की कथित घटना का विवरण देते हुए स्वतंत्र जांच और प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की गई है।
कुलाधिपति को शिकायत भेजे जाने के बाद अब इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से किसी जांच या कार्रवाई का निर्णय सामने आता है या नहीं, इस पर नजर रहेगी।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों पर आधारित है। डॉ. आर.के. वर्मा की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या उनका पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना आवश्यक होगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने कई सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने कई सवाल हैं। पहला सवाल यह है कि 10 सितंबर को परीक्षा कक्ष में वास्तव में क्या हुआ था। दूसरा सवाल यह है कि क्या घटना के समय मौजूद लोगों से कोई आधिकारिक रिपोर्ट या बयान लिया गया है।
इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या विश्वविद्यालय के पास घटना से संबंधित कोई सीसीटीवी फुटेज या अन्य रिकॉर्ड उपलब्ध है। यदि उपलब्ध है तो जांच में उसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा पीएचडी शोधार्थी की शैक्षणिक प्रक्रिया का है। यदि शिकायतकर्ता द्वारा उठाई गई आशंका को ध्यान में रखा जाए तो यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि किसी व्यक्तिगत विवाद का असर शोधार्थी की शैक्षणिक प्रक्रिया पर न पड़े।
निष्पक्ष जांच से सामने आ सकता है सच
ऐसे मामलों में आरोप और तथ्य के बीच अंतर करना बेहद जरूरी होता है। शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करते। दूसरी ओर, किसी वरिष्ठ शिक्षक या अधिकारी के खिलाफ औपचारिक शिकायत को भी केवल आरोप कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
निष्पक्ष जांच के दौरान शिकायतकर्ता, संबंधित अधिकारी, परीक्षा कक्ष में मौजूद कर्मचारी, पर्यवेक्षक, निरीक्षक और परीक्षार्थियों के बयान लिए जा सकते हैं। उपलब्ध दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद ही घटना की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
यदि जांच में शिकायत के आरोप सही पाए जाते हैं तो विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। वहीं यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो उस स्थिति को भी आधिकारिक जांच के निष्कर्ष के रूप में सामने रखा जा सकेगा।
अब विश्वविद्यालय के आधिकारिक रुख का इंतजार
लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़े इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय प्रशासन का आधिकारिक रुख होगा। शिकायतकर्ता ने कुलाधिपति से स्वतंत्र जांच की मांग की है। ऐसे में यदि जांच शुरू होती है तो उसके निष्कर्ष से यह स्पष्ट हो सकेगा कि 10 सितंबर को हुई कथित घटना में वास्तव में क्या परिस्थितियां थीं।
साथ ही पीएचडी शोधार्थी की थीसिस मूल्यांकन, viva-voce और डिग्री से संबंधित प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने की मांग भी इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिलहाल यह मामला शिकायत और आरोपों के स्तर पर है। इसलिए किसी भी पक्ष को दोषी ठहराने के बजाय सभी संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना और स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है।
नोट: इस खबर में डॉ. आर.के. वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोप शिकायतकर्ता के प्रत्यावेदन के आधार पर लिखे गए हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है। डॉ. आर.के. वर्मा या लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी निष्पक्ष रूप से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
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