लखनऊ/भदोही। उत्तर प्रदेश में गोंड और धुरिया समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन उत्तर प्रदेश की ओर से जारी मांग-पत्र में उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में गोंड-धुरिया समाज को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की मांग की गई है। संगठन ने कहा है कि एक ही सामाजिक समुदाय को अलग-अलग जिलों में अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाने की स्थिति को समाप्त किया जाना चाहिए।
संगठन की ओर से जारी पत्र के मुताबिक, गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया गया। इस दौरान गोंडवाना गौरव महाराजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस को भी मनाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल गोंडवाना कोया पूनेम भूमका सेवा संस्था के राष्ट्रीय सहसचिव शिव शंकर गोंड ने की, जबकि संचालन भूमक श्रीचंद धुर्वा ने किया।
कार्यक्रम में महाराजा शंकर शाह के चित्र पर हल्दी-चावल का तिलक लगाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। वक्ताओं ने महाराजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह के इतिहास तथा स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उनके बलिदान को याद किया।
ST दर्जे की मांग को लेकर सौंपा गया मांग-पत्र
गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन उत्तर प्रदेश की ओर से जारी मांग-पत्र में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश की गोंड और धुरिया जनजाति को अनुसूचित जनजाति घोषित किए जाने की मांग रखी गई है। संगठन का कहना है कि इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार को आवश्यक प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार को भेजना चाहिए।
मांग-पत्र में संगठन ने पुराने आयोगों और संसदीय प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश में गोंड और धुरिया समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। संगठन के अनुसार, कालेलकर आयोग और बाद की संसदीय समितियों के स्तर पर भी इस विषय को उठाया गया था।
हालांकि, इन ऐतिहासिक दावों के संबंध में अलग-अलग दस्तावेजों और सरकारी अभिलेखों के आधार पर विस्तृत सत्यापन की आवश्यकता है। वर्तमान आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, जनजातीय कार्य मंत्रालय की उत्तर प्रदेश संबंधी सूची में “Gond, Dhuria, Nayak, Ojha, Pathari, Raj Gond” को निर्धारित जिलों में अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। मंत्रालय की उपलब्ध सूची में इन समुदायों के लिए जिलावार सीमा भी दी गई है।
जिलावार व्यवस्था को खत्म करने की मांग
गोंडवाना आंदोलन की सबसे प्रमुख मांगों में से एक यह है कि गोंड और धुरिया समाज को केवल कुछ निर्धारित जिलों तक सीमित रखने के बजाय पूरे उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी जाए।
संगठन का तर्क है कि यदि एक ही सामाजिक समुदाय के लोग प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रहते हैं, तो केवल जिले के आधार पर उनकी सामाजिक और संवैधानिक श्रेणी में अंतर नहीं होना चाहिए। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के कारण समुदाय के लोगों के बीच सामाजिक, प्रशासनिक और आरक्षण से जुड़े सवाल पैदा होते हैं।
जनजातीय कार्य मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में वर्तमान में उत्तर प्रदेश के लिए गोंड, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी और राज गोंड को कुछ निर्धारित जिलों में ST सूची के अंतर्गत रखा गया है। उपलब्ध सरकारी सूची में महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, संत कबीर नगर, कुशीनगर, चंदौली और भदोही का उल्लेख है।
यही जिलावार सीमा आंदोलन की मांग का प्रमुख आधार बनी हुई है। संगठन चाहता है कि इस व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाए और प्रदेश के अन्य जिलों में रहने वाले संबंधित समुदाय के लोगों को भी समान संवैधानिक दर्जा देने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
संगठन ने कहा—एक ही समाज को अलग-अलग श्रेणियों में रखना उचित नहीं
मांग-पत्र में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में गोंड समाज के एक हिस्से को अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अन्य श्रेणियों में रखे जाने से समुदाय के भीतर असमानता की स्थिति बन रही है।
आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि इससे सामाजिक एकरूपता और समुदाय की पहचान से जुड़े प्रश्न भी सामने आते हैं। संगठन का दावा है कि अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकरण के कारण समाज के लोगों के बीच मतभेद और समस्याएं बढ़ रही हैं।
गोंडवाना आंदोलन ने मांग की है कि प्रदेश सरकार इस विषय को गंभीरता से लेते हुए संबंधित समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा करे और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजे।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अनुसूचित जनजाति की सूची में किसी समुदाय को शामिल करना या सूची में बदलाव करना संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया से जुड़ा विषय है। इसलिए किसी संगठन की मांग और सरकार द्वारा उस मांग पर लिया गया आधिकारिक निर्णय अलग-अलग बातें हैं।
गोंड संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण की भी मांग
ST दर्जे की मांग के साथ-साथ आंदोलन ने गोंड समाज की संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों को भी उठाया है।
मांग-पत्र में कहा गया है कि गोंड समाज की सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक पहचान के संरक्षण की आवश्यकता है। संगठन का कहना है कि समुदाय की पारंपरिक पहचान से जुड़े विषयों को भी सार्वजनिक विमर्श और सरकारी नीतियों में स्थान मिलना चाहिए।
आंदोलन ने गोंडी धर्म से जुड़े पुराने रिकॉर्ड में “ट्राइबल कॉलम” की व्यवस्था को बहाल किए जाने की मांग भी उठाई है। मांग-पत्र में दावा किया गया है कि इसे 1951 में समाप्त कर दिया गया था और इसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए।
यह मांग मुख्य रूप से समुदाय की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान से संबंधित है। इस मुद्दे पर आगे की स्थिति सरकार के आधिकारिक निर्णय और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
महाराजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को किया गया याद
धरना-प्रदर्शन के दौरान महाराजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह के बलिदान को भी प्रमुखता से याद किया गया।
आंदोलन के वक्ताओं ने महाराजा शंकर शाह को गोंडवाना क्षेत्र के ऐतिहासिक शासक के रूप में याद करते हुए उनके और उनके पुत्र रघुनाथ शाह के बलिदान का उल्लेख किया। संगठन के पत्र के अनुसार, अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों के कारण पिता-पुत्र को दंडित किया गया था।
कार्यक्रम में उनके चित्र पर हल्दी-चावल का तिलक लगाकर श्रद्धांजलि दी गई। संगठन ने कहा कि समाज के युवाओं को अपने इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े योगदान के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।
महाराजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का स्मरण गोंड समाज के विभिन्न सामाजिक संगठनों और समूहों द्वारा किया जाता रहा है। आंदोलन ने भी अपने कार्यक्रम को उनके बलिदान दिवस से जोड़ते हुए समाज की एकता और अधिकारों के मुद्दे को सामने रखा।
कई सामाजिक प्रतिनिधियों ने रखी अपनी बात
मांग-पत्र में कार्यक्रम से जुड़े कई पदाधिकारियों और सामाजिक प्रतिनिधियों के नाम भी दर्ज हैं। इनमें भूमक राजेश गोंड, कोयटा मुर्शेनाल, रामनाथ गोंड, संतोष कश्यप, दुर्गा प्रसाद गोंड, अजय कुमार गोंड और अशोक धुरिया सहित अन्य प्रतिनिधियों का उल्लेख किया गया है।
संगठन का कहना है कि गोंड समाज के विभिन्न सामाजिक संगठनों और प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाकर प्रदेश स्तर पर इस मांग को आगे बढ़ाया जाएगा।
आंदोलन का जोर इस बात पर है कि उत्तर प्रदेश सरकार समुदाय की मांग को औपचारिक रूप से केंद्र सरकार तक पहुंचाए। संगठन के अनुसार, इसके लिए आवश्यक प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार को भेजा जाना चाहिए।
सरकारी रिकॉर्ड में क्या स्थिति है?
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा प्रकाशित राज्यवार अनुसूचित जनजाति सूची के अनुसार उत्तर प्रदेश में गोंड, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी और राज गोंड को कुछ निर्धारित जिलों में ST सूची में शामिल किया गया है। मंत्रालय की सूची में उत्तर प्रदेश के लिए अन्य अनुसूचित जनजातियों के नाम भी दर्ज हैं।
मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में भी उत्तर प्रदेश के ST समुदायों और उनकी जिलावार स्थिति का उल्लेख मिलता है। रिपोर्ट में गोंड-धुरिया सहित संबंधित समुदायों को निर्धारित जिलों में सूचीबद्ध किया गया है।
इसलिए वर्तमान विवाद का मूल प्रश्न यह है कि क्या उत्तर प्रदेश में निर्धारित जिलों तक सीमित ST व्यवस्था को आगे बढ़ाकर संबंधित समुदाय को प्रदेश के अन्य जिलों में भी समान रूप से लागू किया जाए। इस पर निर्णय सरकारी प्रक्रिया, उपलब्ध सामाजिक-प्रशासनिक आंकड़ों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत होना है।
आगे की रणनीति पर नजर
गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन की ओर से उठाई गई मांग के बाद अब निगाह उत्तर प्रदेश सरकार की अगली कार्रवाई पर रहेगी। यदि सरकार इस विषय में प्रस्ताव तैयार करती है या केंद्र सरकार को कोई औपचारिक संस्तुति भेजती है, तो यह मांग अगले चरण में प्रवेश कर सकती है।
वहीं, आंदोलन से जुड़े संगठनों के सामने यह चुनौती भी होगी कि वे अपनी मांग के समर्थन में ऐतिहासिक, सामाजिक और प्रशासनिक दस्तावेजों को व्यवस्थित रूप से सरकार के सामने रखें। जिलावार ST व्यवस्था में बदलाव जैसे विषयों में आधिकारिक रिकॉर्ड, समुदाय से संबंधित आंकड़े और संवैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गोंडवाना आंदोलन ने फिलहाल अपनी मांग को स्पष्ट कर दिया है—उत्तर प्रदेश में गोंड और धुरिया समाज के लिए ST दर्जे को व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में सरकार प्रस्ताव तैयार करे और केंद्र को भेजे। इसके साथ ही संगठन ने गोंड समाज की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के संरक्षण से जुड़े मुद्दों को भी अपनी मांगों में शामिल किया है।
अब देखना होगा कि इस मांग पर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से क्या आधिकारिक कदम उठाया जाता है और क्या यह विषय केंद्र सरकार के स्तर तक औपचारिक प्रस्ताव के रूप में पहुंचता है।
प्रमुख मांगें
- उत्तर प्रदेश के गोंड-धुरिया समाज को व्यापक स्तर पर ST दर्जा देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
- उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाए।
- जिलावार ST व्यवस्था को लेकर पुनर्विचार किया जाए।
- गोंड समाज की सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान के संरक्षण के लिए कदम उठाए जाएं।
- गोंडी धर्म से संबंधित “ट्राइबल कॉलम” को बहाल करने की मांग पर विचार किया जाए।
- समुदाय से जुड़े संगठनों और प्रतिनिधियों के साथ सरकार संवाद करे।
नोट: इस रिपोर्ट में आंदोलन द्वारा जारी मांग-पत्र में किए गए दावों को संगठन के पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ST सूची और जिलावार स्थिति के संबंध में जहां सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध था, वहां केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेजों को आधार बनाया गया है।
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