प्रो. राकेश कुमार सिंह, शोधार्थी वरालिका निगम और अधिवक्ता सारांश चतुर्वेदी के नाम पेटेंट संख्या 603300; ब्लॉकचेन, क्रिप्टोग्राफिक हैश और बायोमेट्रिक सत्यापन से सुरक्षित होगी डिजिटल वसीयत
लखनऊ, 22 सितंबर 2026। लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय ने विधि और तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। विश्वविद्यालय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, विधि संकाय के प्रोफेसर (डॉ.) राकेश कुमार सिंह, शोधार्थी वरालिका निगम और उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सारांश चतुर्वेदी द्वारा संयुक्त रूप से विकसित ‘छेड़छाड़-रोधी, सुरक्षित, अपरिवर्तनीय एवं एआई-संवर्धित डिजिटल वसीयत प्रणाली’ को भारत सरकार की ओर से भारतीय पेटेंट प्रदान किया गया है। विश्वविद्यालय के मुताबिक इस आविष्कार को 21 सितंबर 2026 को पेटेंट संख्या 603300 के साथ ग्रांट किया गया।
विश्वविद्यालय के अनुसार इस प्रणाली का उद्देश्य वसीयत तैयार करने से लेकर उसके सुरक्षित डिजिटल भंडारण और वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद उसके निर्देशों के निष्पादन तक की प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल करना है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ब्लॉकचेन, क्रिप्टोग्राफिक हैश, बायोमेट्रिक सत्यापन और व्यवहार संबंधी डिजिटल संकेतकों जैसी तकनीकों को शामिल करने की परिकल्पना की गई है।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वसीयत से जुड़े विवाद अक्सर दस्तावेज की प्रामाणिकता, उसमें बदलाव, हस्ताक्षर, वसीयतकर्ता की वास्तविक इच्छा और वसीयत तैयार करते समय उसकी स्वेच्छा जैसे सवालों से जुड़े होते हैं। प्रस्तावित प्रणाली इन पहलुओं को तकनीकी तरीके से रिकॉर्ड और सत्यापित करने का प्रयास करती है।
मार्च 2025 में किया गया था पेटेंट आवेदन
लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक इस प्रणाली के लिए पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत मार्च 2025 में ई-फाइलिंग के माध्यम से आवेदन किया गया था। विश्वविद्यालय का कहना है कि तकनीकी और कानूनी परीक्षण की प्रक्रिया के बाद 21 सितंबर 2026 को इस आविष्कार को पेटेंट संख्या 603300 के साथ ग्रांट मिला।
विश्वविद्यालय ने इसे विधि संकाय के लिए विशेष उपलब्धि बताया है। सामान्य तौर पर पेटेंट को किसी आविष्कार की नवीनता और उसके आवेदक को दिए गए कानूनी अधिकारों से जोड़ा जाता है। हालांकि, किसी पेटेंट का मिलना अपने आप में उस तकनीक के व्यापक व्यावसायिक इस्तेमाल या हर परिस्थिति में उसके कानूनी रूप से स्वीकार्य होने की गारंटी नहीं होता। इस प्रणाली के वास्तविक उपयोग में मौजूदा उत्तराधिकार कानूनों और न्यायिक प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होगा।
क्या है ‘डिजिटल वसीयत’ प्रणाली?
वसीयत किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति और अन्य अधिकारों के संबंध में उसकी इच्छा को दर्ज करने वाला महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज होती है। पारंपरिक व्यवस्था में वसीयत कागज पर तैयार की जाती है और बाद में उसकी वैधता को लेकर विवाद होने पर अदालत में उसके दस्तावेज, हस्ताक्षर, गवाह और वसीयतकर्ता की मानसिक एवं स्वैच्छिक स्थिति जैसे पहलुओं पर सवाल उठ सकते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय की ओर से बताया गया है कि प्रस्तावित डिजिटल प्रणाली वसीयत को केवल एक डिजिटल फाइल के रूप में सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। इसमें दस्तावेज तैयार करने, वसीयतकर्ता की पहचान सत्यापित करने, उसकी सहमति दर्ज करने, दस्तावेज की डिजिटल अखंडता बनाए रखने और भविष्य में उसकी प्रामाणिकता जांचने के लिए अलग-अलग तकनीकी स्तरों को जोड़ा गया है।
इसका एक उद्देश्य यह भी है कि भविष्य में कोई व्यक्ति यह दावा न कर सके कि मूल दस्तावेज में उसकी जानकारी के बिना बदलाव किया गया था।
एआई करेगा दस्तावेज और जोखिम का विश्लेषण
इस पेटेंटेड प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं में एआई आधारित विश्लेषण को शामिल किया गया है। विश्वविद्यालय के अनुसार सिस्टम में नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) और मशीन लर्निंग आधारित तकनीकों का इस्तेमाल प्रस्तावित है।
एआई इंजन वसीयत में इस्तेमाल भाषा का विश्लेषण कर सकता है और अस्पष्टता, संभावित विरोधाभास अथवा अधूरे विवरण जैसी चीजों को चिन्हित कर सकता है। इसका उद्देश्य वसीयतकर्ता को दस्तावेज में मौजूद संभावित कमियों की जानकारी देना और आवश्यक कानूनी सावधानियों की ओर ध्यान आकर्षित करना है।
प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक सिस्टम को संबंधित क्षेत्राधिकार के कानूनों के डेटाबेस से मिलान करने की क्षमता के साथ डिजाइन किया गया है। इससे यह जांचने में मदद मिल सकती है कि तैयार किया गया दस्तावेज संबंधित कानूनी आवश्यकताओं के अनुरूप है या नहीं।
हालांकि, एआई द्वारा किया गया विश्लेषण कानूनी सलाह या न्यायालय के अंतिम निर्णय का स्वतः विकल्प नहीं माना जा सकता। किसी वास्तविक वसीयत की वैधता अंततः लागू कानून और सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगी।
चेहरे, आवाज और बायोमेट्रिक सत्यापन का इस्तेमाल
प्रस्तावित प्रणाली में वसीयतकर्ता की पहचान और उसकी सहमति को मजबूत करने के लिए कई स्तरों के सत्यापन का प्रावधान बताया गया है।
विश्वविद्यालय के अनुसार इसमें चेहरे की पहचान, आवाज के विश्लेषण और फिंगरप्रिंट जैसे बायोमेट्रिक संकेतकों के साथ व्यवहार संबंधी पैटर्न का भी विश्लेषण किया जा सकता है। इसमें कीबोर्ड पर टाइपिंग की गति और माउस की गतिविधियों जैसे डिजिटल व्यवहार को भी शामिल किया गया है।
इसका उद्देश्य यह पता लगाने में सहायता करना है कि वसीयत तैयार करने वाला व्यक्ति स्वयं सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है या नहीं और क्या दस्तावेज तैयार करते समय उसकी गतिविधियों में किसी असामान्य पैटर्न के संकेत मिल रहे हैं।
विश्वविद्यालय के मुताबिक आवाज और वीडियो के माध्यम से भी वसीयतकर्ता की सहमति रिकॉर्ड करने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे भविष्य में विवाद होने पर उस समय दर्ज किए गए डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की संभावना बनती है।
ब्लॉकचेन और क्रिप्टोग्राफिक हैश से दस्तावेज की सुरक्षा
इस प्रणाली का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा ब्लॉकचेन और क्रिप्टोग्राफिक हैश तकनीक है।
किसी डिजिटल दस्तावेज का क्रिप्टोग्राफिक हैश उसके कंटेंट से तैयार होने वाला एक विशिष्ट डिजिटल फिंगरप्रिंट होता है। यदि मूल डेटा में बदलाव किया जाता है तो सामान्यतः उसका हैश भी बदल जाता है। इसी सिद्धांत का उपयोग प्रस्तावित प्रणाली में दस्तावेज की अखंडता जांचने के लिए किया जाएगा।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अंतिम सहमति के बाद वसीयत का विशिष्ट डिजिटल हैश टाइमस्टैम्प के साथ ब्लॉकचेन पर दर्ज किया जाएगा। इससे बाद में उपलब्ध दस्तावेज और मूल रिकॉर्ड के बीच तुलना करके यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दस्तावेज में बदलाव हुआ है या नहीं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य डिजिटल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाना और अनधिकृत बदलाव की स्थिति को पहचानने योग्य बनाना है।
मृत्यु के बाद निष्पादन की परिकल्पना
इस पेटेंटेड प्रणाली का सबसे अलग पहलू वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद की प्रक्रिया से संबंधित बताया गया है।
विश्वविद्यालय के अनुसार सिस्टम आधिकारिक मृत्यु रिकॉर्ड और दो-स्तरीय सत्यापन प्रक्रिया के माध्यम से मृत्यु की पुष्टि करने के बाद वसीयत में दर्ज निर्देशों के अनुसार आगे की डिजिटल प्रक्रिया शुरू करने के लिए डिजाइन किया गया है।
प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि पुष्टि के बाद संबंधित प्रोटोकॉल वसीयत को डिक्रिप्ट कर अधिकृत वारिसों और प्रतिनिधियों को संपत्ति से संबंधित निर्देश उपलब्ध कराने की दिशा में काम करेगा।
डिजिटल संपत्तियों और बैंक खातों जैसी आधुनिक संपत्तियों के प्रबंधन को भी इस प्रणाली की संभावित क्षमताओं में शामिल बताया गया है। हालांकि, वास्तविक संपत्ति का हस्तांतरण संबंधित बैंकिंग, संपत्ति, उत्तराधिकार और अन्य लागू कानूनी प्रक्रियाओं के अधीन ही होगा।
विवाद की स्थिति में एआई सुझा सकता है समाधान का रास्ता
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार यदि वारिसों के बीच वसीयत को लेकर विवाद उत्पन्न होता है तो सिस्टम उपलब्ध कानूनी मिसालों और संबंधित जानकारी के आधार पर मध्यस्थता अथवा विवाद समाधान के संभावित रास्ते सुझाने में सक्षम हो सकता है।
यहां भी एआई की भूमिका सहायक तकनीक की होगी। किसी विवाद का बाध्यकारी कानूनी समाधान अदालत, अधिकृत मध्यस्थ या संबंधित सक्षम संस्था द्वारा लागू कानूनों के अनुसार ही किया जाएगा।
डिजिटल वसीयत की कानूनी स्वीकार्यता पर महत्वपूर्ण सवाल
इस उपलब्धि के साथ एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी जुड़ा है। विश्वविद्यालय ने स्वयं अपनी प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 और विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के तहत डिजिटल वसीयत की कानूनी स्वीकार्यता का अंतिम स्वरूप अदालतों और नीति-निर्माताओं द्वारा तय किया जाना बाकी है।
यानी पेटेंट मिलने का अर्थ यह नहीं है कि देश में हर प्रकार की डिजिटल वसीयत स्वतः वैध या अदालत में स्वीकार्य हो गई है। पेटेंट तकनीकी आविष्कार को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है, जबकि किसी विशेष वसीयत की वैधता उसके निर्माण, हस्ताक्षर, गवाह, लागू व्यक्तिगत कानून, संपत्ति की प्रकृति और अन्य कानूनी आवश्यकताओं पर निर्भर कर सकती है।
यही वजह है कि इस प्रणाली को डिजिटल तकनीक और उत्तराधिकार कानून के बीच एक संभावित तकनीकी सेतु के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसके व्यापक कानूनी इस्तेमाल के लिए नियामकीय और न्यायिक पहलुओं का स्पष्ट होना जरूरी रहेगा।
विधि और तकनीक के मेल की दिशा में कदम
लखनऊ विश्वविद्यालय की यह उपलब्धि कानून के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार की बढ़ती भूमिका की ओर भी संकेत करती है। लंबे समय तक कानूनी दस्तावेज मुख्य रूप से कागजी रिकॉर्ड, हस्ताक्षर और भौतिक अभिलेखों पर आधारित रहे हैं। डिजिटल युग में दस्तावेजों की सुरक्षा, पहचान सत्यापन, डेटा की अखंडता और रिकॉर्ड की उपलब्धता जैसी चुनौतियां बढ़ी हैं।
ऐसे में ब्लॉकचेन, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और एआई जैसी तकनीकों का कानूनी दस्तावेजों के क्षेत्र में इस्तेमाल शोध का एक उभरता हुआ क्षेत्र है। प्रस्तावित डिजिटल वसीयत प्रणाली इसी दिशा में एक तकनीकी मॉडल प्रस्तुत करती है।
विश्वविद्यालय परिवार ने दी बधाई
लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन, विधि संकाय के शिक्षकों और शोधार्थियों ने इस उपलब्धि के लिए प्रो. (डॉ.) राकेश कुमार सिंह, शोधार्थी वरालिका निगम और अधिवक्ता सारांश चतुर्वेदी को बधाई दी है।
विश्वविद्यालय की ओर से उम्मीद जताई गई है कि यह शोध भविष्य में डिजिटल कानूनी दस्तावेजों, संपत्ति प्रबंधन और उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रियाओं में तकनीकी नवाचार के लिए नए रास्ते खोल सकता है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय की यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब कानून और तकनीक का दायरा तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रहा है। ‘एआई-संवर्धित डिजिटल वसीयत’ का यह पेटेंट भविष्य में वसीयत निर्माण और रिकॉर्ड सुरक्षा की प्रक्रिया को किस हद तक बदलता है, यह इसके व्यावहारिक और कानूनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
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