लखनऊ: उत्तर प्रदेश में आयुष इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड को लेकर चल रहा आंदोलन अब पुलिस कार्रवाई और डॉक्टरों की ओर से लगाए गए कथित अपमानजनक टिप्पणी के आरोपों के बाद और चर्चा में आ गया है। पिछले कई दिनों से ₹7,500 मासिक स्टाइपेंड को बढ़ाकर ₹25,000 किए जाने की मांग कर रहे आयुष इंटर्न डॉक्टरों ने लखनऊ के 1090 चौराहे पर कैंडल मार्च निकाला। डॉक्टरों ने हाथों में मोमबत्तियां और “ब्लैक डे” से जुड़े पोस्टर लेकर सोमवार को जीपीओ-गांधी प्रतिमा के पास हुई पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। इस कैंडल मार्च की पुष्टि स्थानीय मीडिया रिपोर्टों ने भी की है।
आंदोलनकारी डॉक्टरों का कहना है कि उनकी लड़ाई केवल स्टाइपेंड की राशि तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब यह सम्मान, समानता और आयुष चिकित्सा पद्धति की स्वीकार्यता से भी जुड़ गई है। डॉक्टरों के मुताबिक, वे लगातार सरकार से लिखित आदेश की मांग कर रहे हैं ताकि स्टाइपेंड बढ़ाने को लेकर स्पष्ट निर्णय सामने आए।
15-16 दिन से जारी है आंदोलन
आयुष इंटर्न डॉक्टरों के अनुसार, स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर उनका आंदोलन करीब 15 से 16 दिनों से जारी है। डॉक्टरों का कहना है कि वर्तमान में उन्हें करीब ₹7,500 प्रतिमाह स्टाइपेंड मिल रहा है और वे इसे बढ़ाकर ₹25,000 प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं।
इस मांग को लेकर इससे पहले भी लखनऊ में प्रदर्शन हो चुके हैं। 11 सितंबर को हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा के सामने प्रदेश के 19 सरकारी आयुष कॉलेजों से जुड़े करीब 400 इंटर्न डॉक्टरों के प्रदर्शन की रिपोर्ट सामने आई थी। उस समय भी प्रदर्शनकारियों ने ₹7,500 से ₹25,000 मासिक स्टाइपेंड किए जाने की मांग रखी थी।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आयुष पाठ्यक्रम में एक साल की इंटर्नशिप के दौरान वे अस्पतालों और मरीजों से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाते हैं। उनका तर्क है कि मौजूदा स्टाइपेंड लखनऊ जैसे शहर में रहने और दैनिक खर्चों के लिहाज से बेहद कम है।
आश्वासन के बाद भी फैसला नहीं होने का आरोप
कैंडल मार्च के दौरान आयुष डॉक्टरों ने दावा किया कि उन्हें स्टाइपेंड बढ़ाने को लेकर पहले आश्वासन दिया गया था। आंदोलनकारी डॉक्टरों के मुताबिक, उन्हें सात से दस दिन के भीतर स्टाइपेंड बढ़ने की उम्मीद बताई गई थी, लेकिन तय समय बीतने के बाद भी कोई लिखित आदेश सामने नहीं आया।
डॉक्टरों का कहना है कि इसी वजह से आंदोलन आगे बढ़ता गया। उनके अनुसार, सरकार या संबंधित विभाग की ओर से केवल मौखिक आश्वासन के बजाय उन्हें आधिकारिक शासनादेश चाहिए।
यही मुद्दा अब आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया है। डॉक्टरों का कहना है कि जब तक स्टाइपेंड बढ़ाने का लिखित आदेश जारी नहीं होता, तब तक वे अपने आंदोलन को समाप्त नहीं करेंगे।
जीपीओ पर प्रदर्शन के बाद पुलिस कार्रवाई का आरोप
22 सितंबर को हजरतगंज स्थित जीपीओ और गांधी प्रतिमा के पास प्रदर्शन कर रहे आयुष इंटर्न डॉक्टरों को पुलिस द्वारा हटाए जाने की घटना सामने आई। अमर उजाला और अन्य मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बल प्रयोग का आरोप लगाया और कुछ डॉक्टरों को हिरासत में लिए जाने की बात भी सामने आई।
आंदोलनकारी डॉक्टरों का दावा है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से बैठे थे और अपनी मांग को लेकर अधिकारियों से बातचीत की उम्मीद कर रहे थे। डॉक्टरों के मुताबिक, देर शाम स्थिति बदली और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाने के लिए बल प्रयोग किया।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासन और पुलिस का विस्तृत आधिकारिक पक्ष इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है। इसलिए लाठीचार्ज और कार्रवाई से जुड़े डॉक्टरों के आरोपों को उनके दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
“हम डॉक्टर हैं या नहीं?”—सम्मान का सवाल उठा रहे डॉक्टर
कैंडल मार्च के दौरान बातचीत में डॉक्टरों ने कहा कि आंदोलन अब केवल ₹25,000 स्टाइपेंड की मांग तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, अधिकारियों के साथ हुई बातचीत में आयुष डॉक्टरों के काम और उनकी चिकित्सा पद्धति को लेकर जो बातें कही गईं, उनसे उन्हें निराशा हुई।
आंदोलनकारी डॉक्टरों का दावा है कि बैठक में उनसे कहा गया कि वे सर्जरी नहीं करते, इसलिए उन्हें दूसरे मेडिकल इंटर्न के बराबर स्टाइपेंड देने का आधार क्या है। इसी कथित टिप्पणी को लेकर डॉक्टरों ने सवाल उठाया कि क्या डॉक्टर होने की पहचान केवल सर्जरी करने से तय होती है?
डॉक्टरों का तर्क है कि चिकित्सा की अलग-अलग पद्धतियों में उपचार के तरीके अलग हो सकते हैं। उनके मुताबिक, आयुष पद्धतियों में इलाज का तरीका सर्जिकल प्रक्रिया पर आधारित नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि उस पद्धति से जुड़े चिकित्सकों की भूमिका समाप्त हो जाती है।
“अगर आयुष काम नहीं करता तो 19 कॉलेज क्यों?”
कैंडल मार्च में डॉक्टरों ने एक बड़ा सवाल भी उठाया। उनका कहना था कि अगर आयुष चिकित्सा पद्धति को सरकार महत्व देती है और इसके लिए अलग मंत्रालय तथा मेडिकल कॉलेज संचालित किए जा रहे हैं, तो आयुष डॉक्टरों को लेकर ऐसी टिप्पणियां क्यों की जाती हैं?
इसी संदर्भ में आंदोलनकारी डॉक्टरों ने कहा कि यदि उन्हें डॉक्टर के रूप में सम्मान और बराबरी नहीं दी जाती तो उत्तर प्रदेश के 19 आयुष कॉलेजों को चलाने का औचित्य क्या है।
यह बयान आंदोलनकारियों की मांग और उनकी नाराजगी को दर्शाता है। इसे डॉक्टरों द्वारा सरकार के सामने रखे गए सवाल के रूप में देखा जा रहा है, न कि सरकार द्वारा लिया गया कोई निर्णय।
स्टाइपेंड बनाम महंगाई का तर्क
आयुष डॉक्टरों ने अपने स्टाइपेंड की तुलना मौजूदा जीवन-यापन की लागत से भी की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ₹7,500 मासिक यानी करीब ₹250 प्रतिदिन की राशि में लखनऊ जैसे शहर में कमरा, भोजन और अन्य आवश्यक खर्च निकालना मुश्किल है।
सितंबर की शुरुआती रिपोर्टों में भी यह सामने आया था कि आयुष इंटर्न डॉक्टरों को फिलहाल ₹7,500 मासिक स्टाइपेंड मिलने और इसे ₹25,000 करने की मांग की जा रही है।
डॉक्टरों का कहना है कि वे कई वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद इंटर्नशिप कर रहे हैं। इसलिए उनका मानना है कि स्टाइपेंड को उनकी जिम्मेदारियों और दूसरे मेडिकल इंटर्न के भुगतान के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
आंदोलनकारी बोले—मामला अब सम्मान का है
कैंडल मार्च के दौरान डॉक्टरों ने यह भी कहा कि अब उनकी मांग केवल पैसों की नहीं रह गई है। उनके मुताबिक, ₹25,000 की मांग के साथ-साथ वे चाहते हैं कि आयुष चिकित्सा पद्धति से जुड़े डॉक्टरों को भी समाज और प्रशासन में सम्मान मिले।
एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि जब कोई छात्र NEET जैसी प्रवेश परीक्षा के माध्यम से मेडिकल शिक्षा में आता है और वर्षों तक प्रशिक्षण लेता है, तो उसे यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी चिकित्सा पद्धति दूसरे से कमतर है।
डॉक्टरों ने यह भी कहा कि यदि सरकार आयुष को बढ़ावा देती है, तो जमीनी स्तर पर काम करने वाले छात्रों और इंटर्न डॉक्टरों को भी सुविधाएं और सम्मान मिलना चाहिए।
“सर्जरी नहीं करते” वाले तर्क पर डॉक्टरों की आपत्ति
प्रदर्शनकारियों ने सर्जरी को डॉक्टर की योग्यता का एकमात्र पैमाना मानने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि हर मरीज को सर्जरी की जरूरत नहीं होती और विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में उपचार की अपनी-अपनी पद्धति होती है।
हालांकि, आयुष चिकित्सा पद्धतियों की प्रभावशीलता से जुड़े व्यापक चिकित्सकीय दावों को किसी एक प्रदर्शनकारी के अनुभव या बयान से प्रमाणित नहीं माना जा सकता। कैंडल मार्च में डॉक्टरों ने अपने अनुभवों और मरीजों से जुड़े उदाहरणों का हवाला देकर अपनी बात रखी।
इसी दौरान कुछ डॉक्टरों ने दावा किया कि उनके उपचार से ऐसे मरीजों को लाभ मिला जिन्हें सर्जरी की सलाह दी गई थी। इन व्यक्तिगत अनुभवों को डॉक्टरों के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए; किसी उपचार की प्रभावशीलता का वैज्ञानिक निष्कर्ष इन बयानों से अकेले नहीं निकाला जा सकता।
पुलिस कार्रवाई के बाद “ब्लैक डे”
सोमवार की घटना के बाद मंगलवार को 1090 चौराहे पर डॉक्टरों ने कैंडल मार्च निकालकर विरोध दर्ज कराया। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टरों ने “ब्लैक डे” के पोस्टर लगाए और सोमवार की कार्रवाई पर नाराजगी जताई।
डॉक्टरों का कहना है कि वे गांधी प्रतिमा के सामने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख रहे थे और ऐसे में पुलिस बल प्रयोग से उन्हें चोट पहुंची। प्रदर्शनकारियों ने इस कार्रवाई की जांच और जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग भी उठाई है।
आगे क्या?
आयुष डॉक्टरों के आंदोलन के सामने अब दो प्रमुख मुद्दे दिखाई दे रहे हैं—पहला, ₹7,500 से ₹25,000 स्टाइपेंड बढ़ाने का निर्णय और दूसरा, आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे सवाल।
वाराणसी में भी आयुष इंटर्न डॉक्टरों ने लखनऊ की घटना के विरोध में प्रदर्शन किया और आयुष राज्यमंत्री डॉ. दयाशंकर मिश्र के सामने स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग रखी। रिपोर्ट के अनुसार, मंत्री ने कहा कि उनकी समस्या पर विचार चल रहा है।
लखनऊ में आंदोलनकारी डॉक्टर फिलहाल लिखित आदेश की मांग पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि मौखिक आश्वासन कई बार मिल चुके हैं, लेकिन जब तक सरकारी आदेश सामने नहीं आता, तब तक उनकी मांग पूरी नहीं मानी जाएगी।
निष्कर्ष
लखनऊ में आयुष इंटर्न डॉक्टरों का आंदोलन अब स्टाइपेंड की मांग से आगे बढ़कर सम्मान, समानता और आयुष चिकित्सा पद्धति की संस्थागत स्थिति से जुड़े सवालों तक पहुंच गया है। ₹7,500 से ₹25,000 स्टाइपेंड की मांग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन पुलिस कार्रवाई के बाद और मुखर हुआ है।
1090 चौराहे पर निकाला गया कैंडल मार्च इसी नाराजगी का प्रतीक रहा। डॉक्टरों ने सोमवार की घटना को “ब्लैक डे” बताते हुए कहा कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखते रहेंगे। वहीं, प्रशासन की ओर से पुलिस कार्रवाई और बैठक में कथित टिप्पणियों को लेकर विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने पर ही पूरे घटनाक्रम की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।
फिलहाल सवाल यही है कि क्या सरकार आयुष इंटर्न डॉक्टरों के ₹25,000 स्टाइपेंड की मांग पर लिखित निर्णय लेगी और क्या सोमवार की पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे सवालों पर कोई आधिकारिक जवाब सामने आएगा? आंदोलनकारी डॉक्टरों की नजर अब अगले सरकारी कदम पर है।
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