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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आशा कार्यकर्ताओं और आशा संगिनियों की मांगों को लेकर एक बार फिर आवाज तेज होती दिखाई दी। बड़ी संख्या में आशा कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया और सरकार से मानदेय बढ़ाने, समय पर इंसेंटिव का भुगतान करने तथा सेवा को स्थायी किए जाने की मांग उठाई। प्रदर्शन में शामिल कार्यकर्ताओं ने कहा कि वर्षों से स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य करने के बावजूद उन्हें अपेक्षाकृत कम मानदेय में काम करना पड़ रहा है।

प्रदर्शन के दौरान आशा कार्यकर्ताओं की ओर से सरकार के सामने अपनी आर्थिक और कार्य संबंधी परेशानियां रखी गईं। संगठन की प्रदेश अध्यक्ष उषा पटेल ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि प्रदेश के करीब 75 जिलों से आशा कार्यकर्ता और संगिनियां प्रदर्शन में शामिल हुई हैं। उन्होंने कहा कि आशा कार्यकर्ताओं की ओर से पहले भी कई बार धरना-प्रदर्शन और अधिकारियों को पत्र दिए जा चुके हैं, लेकिन उनकी प्रमुख मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है।

मानदेय बढ़ाने की मांग

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग मानदेय में बढ़ोतरी को लेकर रही। आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा भुगतान उनके काम और बढ़ती महंगाई के अनुपात में पर्याप्त नहीं है। प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि उन्हें लंबे समय से कम राशि में काम करना पड़ रहा है और कई तरह के स्वास्थ्य कार्यक्रमों में उनकी जिम्मेदारी रहती है।

उषा पटेल ने बातचीत में दावा किया कि आशा कार्यकर्ताओं को वर्तमान में करीब 2,000 रुपये के आसपास भुगतान मिल रहा है। उन्होंने कहा कि इतनी राशि में परिवार का खर्च चलाना और काम के दौरान आने-जाने का खर्च उठाना मुश्किल है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मानदेय को सम्मानजनक स्तर तक बढ़ाने की मांग की।

स्थायी करने की मांग भी प्रमुख

आशा कार्यकर्ताओं ने केवल मानदेय बढ़ाने की ही मांग नहीं की, बल्कि अपनी सेवा को स्थायी किए जाने की मांग भी उठाई। प्रदर्शन में शामिल कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे वर्षों से स्वास्थ्य विभाग से जुड़े विभिन्न अभियानों और योजनाओं में काम कर रही हैं, लेकिन अभी भी उनकी सेवा व्यवस्था को लेकर अस्थिरता बनी हुई है।

एक महिला कार्यकर्ता ने बातचीत के दौरान कहा कि वर्षों से काम करने के बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि उनका प्रमुख मुद्दा सेवा को स्थायी करना और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

इंसेंटिव में देरी का भी मुद्दा

प्रदर्शनकारियों ने इंसेंटिव के भुगतान में देरी का मुद्दा भी उठाया। बातचीत में एक आशा कार्यकर्ता ने बताया कि कई बार अलग-अलग कार्यों का इंसेंटिव कई महीने बाद मिलता है। उनके अनुसार, कुछ भुगतान तीन महीने तो कुछ छह महीने तक लंबित रहने की स्थिति सामने आती है।

आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे टीकाकरण, पोलियो अभियान, गर्भवती महिलाओं से जुड़े कार्यक्रम और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं के लिए घर-घर जाकर काम करती हैं। ऐसे में काम के बाद मिलने वाले इंसेंटिव में देरी उनके लिए आर्थिक परेशानी पैदा करती है।

कोरोना काल की सेवाओं का दिया हवाला

प्रदर्शन के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने कोरोना महामारी के समय किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि महामारी के दौरान भी उन्होंने घर-घर जाकर स्वास्थ्य संबंधी जिम्मेदारियां निभाईं और संक्रमित मरीजों तथा परिवारों से जुड़े कार्यों में भाग लिया।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उस दौर में उनकी ड्यूटी पर विशेष दबाव था और छुट्टियों की स्थिति भी सामान्य नहीं थी। उनका कहना है कि महामारी के समय स्वास्थ्य व्यवस्था को जमीनी स्तर पर बनाए रखने में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

टीकाकरण और स्वास्थ्य अभियानों में भूमिका का दावा

आशा कार्यकर्ताओं ने मिशन इंद्रधनुष, पोलियो टीकाकरण और अन्य स्वास्थ्य अभियानों का भी जिक्र किया। प्रदर्शन में शामिल कार्यकर्ताओं का कहना था कि वे स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए गांव और बस्तियों में लगातार काम करती हैं।

कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करना, टीकाकरण के लिए परिवारों को तैयार करना और विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी देना उनके नियमित कार्यों का हिस्सा है। उनका कहना है कि इन जिम्मेदारियों के बावजूद उनके भुगतान और सेवा शर्तों में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ है।

काम का निश्चित समय नहीं होने की शिकायत

प्रदर्शन में शामिल कुछ आशा कार्यकर्ताओं ने अपने काम के समय को लेकर भी शिकायतें रखीं। उनका कहना था कि उनका काम केवल तय घंटों तक सीमित नहीं रहता। क्षेत्र में घर-घर संपर्क, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जुटाने और अभियानों में भाग लेने के कारण उन्हें अलग-अलग समय पर काम करना पड़ता है।

एक कार्यकर्ता ने बातचीत में कहा कि उनके काम की कोई स्पष्ट दिन-रात की समय सीमा नहीं होती और मौसम की परिस्थितियों के बावजूद उन्हें क्षेत्र में जाना पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी जिम्मेदारियों के बदले मिलने वाली राशि उनके श्रम के अनुरूप है या नहीं।

आंगनबाड़ी के मानदेय में वृद्धि का भी उठाया मुद्दा

प्रदर्शन के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय से जुड़े हालिया फैसलों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि यदि दूसरे विभागों से जुड़े मानदेय में वृद्धि की जा सकती है तो आशा कार्यकर्ताओं की मांगों पर भी सरकार को निर्णय लेना चाहिए।

प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि आंगनबाड़ी से जुड़े मानदेय में वृद्धि की घोषणा के बाद आशा कार्यकर्ताओं के बीच भी अपने भुगतान में सुधार की उम्मीद बनी थी। हालांकि, उनके अनुसार अभी तक उनकी मांगों पर उसी स्तर की घोषणा नहीं हुई है।

प्रदर्शन स्थल पर नारेबाजी

प्रदर्शन के दौरान आशा कार्यकर्ताओं और संगिनियों ने अपनी मांगों के समर्थन में नारेबाजी भी की। वीडियो में कार्यकर्ताओं को एकजुटता के नारे लगाते और अपनी मांगों के लिए आवाज उठाते हुए देखा गया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे अपनी आवाज उठाते रहेंगे।

प्रदर्शन में मौजूद वक्ताओं ने कार्यकर्ताओं से एकजुट रहने की अपील की। उनका कहना था कि बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं का एक साथ सामने आना उनकी मांगों की गंभीरता को दिखाता है। प्रदर्शन के दौरान यह भी कहा गया कि आशा कार्यकर्ताओं ने कई वर्षों से स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दिया है और अब वे अपनी सेवा के बदले बेहतर आर्थिक सुरक्षा चाहती हैं।

सरकार से क्या चाहती हैं आशा कार्यकर्ता?

प्रदर्शन के दौरान सामने आई मांगों को मुख्य रूप से इस प्रकार देखा जा सकता है—

  • आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में पर्याप्त वृद्धि की जाए।
  • आशा संगिनियों के भुगतान में भी सुधार किया जाए।
  • वर्षों से काम कर रही आशा कार्यकर्ताओं को स्थायी किए जाने पर निर्णय लिया जाए।
  • लंबित इंसेंटिव का भुगतान समय पर किया जाए।
  • स्वास्थ्य अभियानों और घर-घर किए जाने वाले कार्यों के अनुरूप भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
  • काम के दौरान आने-जाने और अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए आर्थिक सहायता बढ़ाई जाए।

प्रदर्शन में शामिल कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे केवल आर्थिक लाभ की मांग नहीं कर रही हैं, बल्कि अपनी सेवा और जिम्मेदारियों के अनुरूप सम्मानजनक व्यवस्था चाहती हैं।

वर्षों से काम कर रहीं आशा कार्यकर्ता

प्रदर्शनकारियों के अनुसार, बड़ी संख्या में आशा कार्यकर्ता लंबे समय से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कार्य कर रही हैं। उनका कहना है कि गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी पहुंचाने से लेकर टीकाकरण और विभिन्न स्वास्थ्य अभियानों में लोगों को जोड़ने तक उनका जमीनी स्तर पर संपर्क रहता है।

आशा कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि स्वास्थ्य योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इसके बावजूद उन्हें मिलने वाले भुगतान को लेकर लंबे समय से असंतोष बना हुआ है।

आगे भी जारी रह सकती है मांगों को लेकर आवाज

प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो वे आगे भी अपनी आवाज उठाती रहेंगी। संगठन की ओर से यह दावा किया गया कि इस मुद्दे को लेकर पहले भी अधिकारियों और संबंधित मंत्रियों को पत्र दिए गए हैं तथा वार्ता का प्रयास किया गया है।

आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी कड़ी के रूप में काम करती हैं और उनकी आर्थिक स्थिति तथा सेवा शर्तों में सुधार किया जाना जरूरी है। अब उनकी मांगों पर सरकार की ओर से क्या कदम उठाया जाता है, इस पर प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं की नजर बनी हुई है।

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