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नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन ने भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छेड़ दी है। दुनिया के उभरते आर्थिक समूह के नेताओं का भारत आना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उनके साथ मुलाकातें, चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संवाद तथा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की चर्चाएं—इन सबने भारत की कूटनीतिक ताकत को सुर्खियों में ला दिया। लेकिन इसी सम्मेलन के दौरान दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों के आसपास लगाए गए पर्दों और स्क्रीन ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

सवाल यह है कि जब भारत दुनिया के सामने अपनी आर्थिक ताकत, विकास और वैश्विक नेतृत्व का प्रदर्शन कर रहा है, तब उसी देश की राजधानी में रहने वाले गरीब नागरिकों को पर्दों के पीछे क्यों दिखाया जा रहा है? क्या किसी देश की प्रतिष्ठा उसकी चमकती सड़कों, बड़े-बड़े भवनों और विदेशी मेहमानों से तय होती है, या फिर इस बात से कि उसके सबसे कमजोर नागरिक कितने सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जी रहे हैं?

यह सवाल BRICS सम्मेलन की उपलब्धियों को नकारने के लिए नहीं, बल्कि विकास की पूरी तस्वीर देखने के लिए जरूरी है। भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत होना चाहिए, लेकिन उसके विकास का लाभ देश के आम नागरिक तक भी पहुंचना चाहिए। यही वह बिंदु है, जहां BRICS सम्मेलन और दिल्ली की झुग्गियों का विवाद एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

BRICS क्या है और भारत के लिए इसका महत्व क्यों बढ़ गया है?

BRICS दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच है। इसकी शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। बाद में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से इसका नाम BRICS हुआ। समय के साथ इस समूह का विस्तार हुआ और मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात तथा इंडोनेशिया जैसे देशों का समावेश हुआ।

आज BRICS केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है। इसका विस्तार दुनिया की बदलती आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संकेत माना जा रहा है। भारत के लिए इस मंच की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि यहां वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के अतिरिक्त उन देशों के साथ भी सहयोग बढ़ा सकता है, जिनकी अर्थव्यवस्थाएं और राजनीतिक भूमिका लगातार बढ़ रही हैं।

BRICS का उद्देश्य कोई सैन्य गठबंधन बनाना नहीं है। यह NATO जैसा रक्षा संगठन भी नहीं है और न ही संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था। इसका प्रमुख जोर आर्थिक सहयोग, विकास, वित्तीय संस्थाओं में सुधार, व्यापार, निवेश, तकनीक और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने पर है।

भारत के लिए यह मंच अपनी विदेश नीति में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने का अवसर भी देता है। एक तरफ भारत अमेरिका, जापान और यूरोप के साथ तकनीक, निवेश और सुरक्षा के क्षेत्र में संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ BRICS के माध्यम से रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ संवाद जारी रखता है।

भारत को BRICS सम्मेलन से क्या फायदा हो सकता है?

किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का महत्व केवल इस बात से नहीं मापा जाता कि उसमें कितने देशों के नेता शामिल हुए। असली महत्व इस बात का होता है कि सम्मेलन के बाद देश के लिए कौन-से ठोस अवसर पैदा हुए। भारत के संदर्भ में BRICS सम्मेलन से कई महत्वपूर्ण संभावनाएं जुड़ी हुई हैं।

वैश्विक राजनीति में भारत का बढ़ता प्रभाव

भारत लंबे समय से यह मांग उठाता रहा है कि वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की बहस में भारत अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है।

BRICS जैसे मंच पर भारत विकासशील देशों की समस्याओं को सामने रख सकता है। गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों और विकास के लिए वित्त जैसे मुद्दे केवल किसी एक देश की समस्या नहीं हैं। इन पर सामूहिक सहयोग की आवश्यकता है।

यदि भारत इन मुद्दों पर प्रभावी नेतृत्व करता है, तो उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि विकासशील देशों की आवाज के रूप में भी मजबूत हो सकती है।

व्यापार और निवेश के नए रास्ते

BRICS देशों के पास विशाल उपभोक्ता बाजार, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा क्षमता और औद्योगिक संभावनाएं हैं। भारत के लिए इन देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के कई अवसर हैं।

भारतीय दवाइयां, आईटी सेवाएं, कृषि उत्पाद, मशीनरी, इंजीनियरिंग सामान और अन्य औद्योगिक वस्तुएं इन बाजारों में अपनी जगह बना सकती हैं। इसी तरह भारत को ऊर्जा, कच्चे माल और औद्योगिक आपूर्ति के क्षेत्र में सहयोग से लाभ मिल सकता है।

लेकिन यह याद रखना होगा कि व्यापार बढ़ाने के लिए केवल सम्मेलन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बेहतर परिवहन व्यवस्था, आसान भुगतान प्रणाली, व्यापारिक बाधाओं में कमी, भरोसेमंद नीतियां और उद्योगों के बीच वास्तविक साझेदारी जरूरी है।

भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना होगा। यदि BRICS के अवसर केवल बड़ी कंपनियों और बड़े निवेशकों तक सीमित रह गए, तो उसका लाभ व्यापक अर्थव्यवस्था तक नहीं पहुंच पाएगा।

रोजगार और युवाओं के लिए अवसर

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही युवा आबादी रोजगार, कौशल और बेहतर अवसरों की चुनौती का सामना भी कर रही है।

BRICS के माध्यम से यदि तकनीकी सहयोग, विनिर्माण, डिजिटल सेवाओं, ऊर्जा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं आती हैं, तो रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। भारतीय युवाओं के लिए विदेशी बाजारों में सेवाएं देने, नई तकनीक सीखने और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि, रोजगार की संभावना और रोजगार की वास्तविक उपलब्धता में अंतर है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि निवेश और समझौतों के बाद परियोजनाएं जमीन पर उतरें। युवाओं को केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, स्थायी रोजगार और उचित वेतन की जरूरत है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक और विकास परियोजनाएं

BRICS ने न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। भारत जैसे बड़े देश के लिए ऐसे वित्तीय सहयोग का महत्व बहुत अधिक है।

सड़क, रेल, ऊर्जा, जल प्रबंधन, शहरी परिवहन, स्वच्छता और पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं में वित्तीय सहायता का उपयोग किया जा सकता है। यदि इन परियोजनाओं की योजना सही तरीके से बनाई जाए और उनमें पारदर्शिता बरती जाए, तो उनका लाभ करोड़ों नागरिकों तक पहुंच सकता है।

यहीं से दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों का सवाल भी जुड़ता है। यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से शहरों का विकास होता है, तो क्या उस विकास में गरीब परिवारों के आवास, स्वच्छ पानी, शौचालय, स्वास्थ्य और शिक्षा को भी प्राथमिकता दी जाएगी? यही सवाल विकास की असली परीक्षा है।

BRICS बनाम G7: क्या बदल रहा है वैश्विक शक्ति संतुलन?

आज BRICS की तुलना G7 से की जाती है। G7 में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान जैसे विकसित देश शामिल हैं। यह समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था, वित्त, सुरक्षा, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर प्रभावशाली भूमिका निभाता है।

BRICS और G7 की आर्थिक ताकत को समझने के लिए दो अलग-अलग पैमाने महत्वपूर्ण हैं—नाममात्र GDP और क्रय शक्ति समानता यानी PPP।

PPP के आधार पर BRICS देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था को G7 से बड़ी बताया जाता है। इसका कारण चीन, भारत और अन्य बड़े उभरते बाजारों की विशाल आर्थिक क्षमता है। वहीं नाममात्र GDP, प्रति व्यक्ति आय, वैश्विक वित्तीय प्रभाव और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में G7 की ताकत अब भी महत्वपूर्ण है।

BRICS के पास बड़ी आबादी, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा क्षमता और विशाल बाजार हैं। G7 के पास विकसित औद्योगिक ढांचा, उच्च तकनीक, वित्तीय संस्थाओं और वैश्विक पूंजी बाजारों में प्रभाव है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि BRICS ने G7 को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है। दोनों समूहों की ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में है। भारत के लिए सबसे उपयोगी नीति यही है कि वह दोनों मंचों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध बनाए रखे।

भारत को BRICS से विकासशील देशों के साथ सहयोग, ऊर्जा और व्यापार के अवसर मिल सकते हैं, जबकि G7 के देशों से तकनीक, पूंजी, सेमीकंडक्टर, स्वास्थ्य, शिक्षा और औद्योगिक निवेश में लाभ हासिल किया जा सकता है।

क्या BRICS डॉलर की जगह ले सकता है?

BRICS के कुछ सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने, स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को विकसित करने की बात करते रहे हैं।

यह चर्चा भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भुगतान की लागत, मुद्रा विनिमय का जोखिम और वित्तीय निर्भरता जैसे मुद्दे व्यापारियों और उद्योगों को प्रभावित करते हैं।

लेकिन BRICS की कोई साझा मुद्रा अभी डॉलर का स्थान नहीं ले चुकी है। अलग-अलग सदस्य देशों की आर्थिक नीतियां, मुद्राएं, राजनीतिक हित और वित्तीय व्यवस्थाएं अलग हैं। इसलिए साझा मुद्रा या पूरी तरह वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बनाना आसान नहीं है।

भारत को इस विषय पर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बेहतर भुगतान व्यवस्था से लाभ हो सकता है, लेकिन किसी भी नई व्यवस्था की सफलता उसके स्थायित्व, पारदर्शिता और व्यापारिक उपयोगिता पर निर्भर करेगी।

दिल्ली की झुग्गियों पर पर्दे: विकास के साथ सामाजिक न्याय का सवाल

अब उस मुद्दे पर आते हैं, जिसने BRICS सम्मेलन के दौरान सबसे अधिक सामाजिक और राजनीतिक चर्चा पैदा की—दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों को पर्दों और स्क्रीन से ढकना।

सम्मेलन की तैयारियों के दौरान दिल्ली के कुछ इलाकों में सौंदर्यीकरण, सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के लिए बड़े स्तर पर काम किया गया। विदेशी प्रतिनिधियों के आवागमन वाले मार्गों पर साफ-सफाई, सजावट और अस्थायी स्क्रीन लगाए जाने की खबरें सामने आईं। वसंत विहार के कूली कैंप के आसपास भी स्क्रीन लगाए जाने की रिपोर्ट सामने आई।

इस घटना को लेकर आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या शहर की गरीबी को विदेशी मेहमानों से छिपाने की कोशिश की जा रही है? क्या दिल्ली की झुग्गियां भारत की विकास यात्रा की ऐसी तस्वीर हैं, जिन्हें दुनिया के सामने नहीं दिखाना चाहिए?

यहां तथ्य और आरोप के बीच अंतर रखना जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दिल्ली की सभी झुग्गियों को स्थायी रूप से हटाया गया या सभी परिवारों को विस्थापित कर दिया गया। पर्दे और स्क्रीन लगाए जाने की घटना को स्थायी बेदखली के बराबर नहीं माना जा सकता।

लेकिन इस घटना ने जो सवाल खड़ा किया है, वह पूरी तरह जायज है। यदि किसी शहर में गरीबों की बस्ती मौजूद है, तो क्या उसका समाधान पर्दे लगाना होना चाहिए? क्या गरीबी को छिपाने से गरीबी समाप्त हो जाती है? क्या शहर की सुंदरता गरीबों के अधिकारों से बड़ी हो सकती है?

इन सवालों का जवाब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय भी होना चाहिए।

क्या शहर का सौंदर्यीकरण गलत है?

नहीं। किसी भी राजधानी में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान सुरक्षा, स्वच्छता, यातायात और बुनियादी व्यवस्था सुधारना आवश्यक है। दुनिया के सामने अपने शहर की बेहतर छवि प्रस्तुत करना भी किसी सरकार की सामान्य प्राथमिकता हो सकती है।

समस्या तब पैदा होती है, जब सौंदर्यीकरण का अर्थ गरीब नागरिकों को छिपाना या उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करना बन जाए।

दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले परिवार भी उसी शहर की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। वे निर्माण मजदूर हो सकते हैं, घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी वाले, ड्राइवर, सफाई कर्मचारी या छोटे कारोबारी हो सकते हैं। शहर की चमकदार इमारतों, होटलों, बाजारों और परिवहन व्यवस्था में उनकी मेहनत का योगदान होता है।

यदि वही लोग किसी अंतरराष्ट्रीय आयोजन के समय शहर की छवि के लिए समस्या माने जाने लगें, तो यह विकास के मॉडल पर सवाल उठाता है।

शहर सुंदर होना चाहिए, लेकिन सुंदरता का अर्थ केवल छिपाना नहीं, बल्कि सुधारना होना चाहिए। यदि किसी बस्ती में अवैध निर्माण, असुरक्षित आवास या बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तो प्रशासन को कानूनी और मानवीय तरीके से समाधान करना चाहिए।

झुग्गी हटाने की जरूरत हो तो क्या होना चाहिए?

शहरी विकास के लिए कभी-कभी जमीन का पुनर्गठन, सड़क निर्माण, मेट्रो, अस्पताल, स्कूल या अन्य सार्वजनिक परियोजनाएं आवश्यक हो सकती हैं। ऐसे मामलों में कुछ बस्तियों को स्थानांतरित करने की आवश्यकता भी उत्पन्न हो सकती है।

लेकिन किसी भी विकास परियोजना का मूल्यांकन केवल जमीन खाली कराने या सड़क चौड़ी करने से नहीं होना चाहिए। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए।

एक जिम्मेदार शहरी विकास नीति में निम्नलिखित बातें जरूरी हैं:

  • प्रभावित परिवारों को स्पष्ट सूचना और उचित प्रक्रिया मिले।
  • पात्र परिवारों के लिए सम्मानजनक वैकल्पिक आवास की व्यवस्था हो।
  • बच्चों की शिक्षा और परिवारों की आजीविका बाधित न हो।
  • पानी, बिजली, स्वास्थ्य, परिवहन और शौचालय जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों।
  • पुनर्वास की प्रक्रिया पारदर्शी हो और नागरिकों की शिकायतें सुनी जाएं।

यदि झुग्गी हटाने के बाद गरीब परिवार शहर से बहुत दूर भेज दिए जाते हैं, जहां रोजगार और स्कूल तक पहुंच मुश्किल हो जाती है, तो यह केवल आवास का नहीं, बल्कि आजीविका का भी संकट बन जाता है।

क्या दिल्ली की झुग्गियों को हटाने से भविष्य में प्रॉफिट हो सकता है?

यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी बस्ती का पुनर्विकास योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है और वहां रहने वाले परिवारों को बेहतर घर, सुविधाएं और रोजगार के अवसर मिलते हैं, तो शहर और नागरिक दोनों लाभान्वित हो सकते हैं।

बेहतर आवास से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं कम हो सकती हैं। साफ पानी और स्वच्छता से जीवन स्तर सुधर सकता है। सुरक्षित बिजली और मजबूत मकान दुर्घटनाओं का जोखिम घटा सकते हैं। यदि परिवहन और रोजगार की पहुंच बनी रहती है, तो परिवारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो सकती है।

लेकिन यदि केवल जमीन का मूल्य बढ़ाने के लिए गरीब परिवारों को हटा दिया जाए, तो लाभ का बड़ा हिस्सा संपत्ति मालिकों या निजी परियोजनाओं तक सीमित रह सकता है। गरीब नागरिकों को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि झुग्गी हटाने से जमीन की कीमत बढ़ेगी या नहीं। असली सवाल यह है कि उस विकास से वहां रहने वाले परिवारों की जिंदगी बेहतर होगी या नहीं।

यदि किसी परिवार को असुरक्षित झोपड़ी से सुरक्षित घर मिलता है, रोजगार तक पहुंच बनी रहती है और उसके बच्चों की पढ़ाई जारी रहती है, तो यह विकास है। लेकिन यदि उसे बिना पर्याप्त पुनर्वास के उजाड़ दिया जाता है, तो यह सामाजिक न्याय की कसौटी पर असफलता है।

BRICS का लाभ आम आदमी तक कैसे पहुंचेगा?

BRICS सम्मेलन से भारत को वैश्विक प्रतिष्ठा और आर्थिक अवसर मिल सकते हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी सार्थक होगा, जब वह देश के आम नागरिक तक पहुंचे।

यदि निवेश आता है, तो युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए। यदि व्यापार बढ़ता है, तो छोटे कारोबारियों और किसानों को नए बाजार मिलने चाहिए। यदि तकनीकी सहयोग होता है, तो उसका लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध होता है, तो गरीब बस्तियों के आवास और बुनियादी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

भारत की वैश्विक ताकत का अर्थ केवल यह नहीं कि दुनिया के बड़े नेता यहां आएं। इसका अर्थ यह भी है कि भारत अपने नागरिकों के लिए बेहतर जीवन, सुरक्षित आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार सुनिश्चित कर सके।

एक ऐसा देश जो दुनिया के सामने अपनी आर्थिक ताकत दिखाता है, उसे अपने सबसे कमजोर नागरिकों के प्रति भी जिम्मेदारी निभानी होगी। वैश्विक नेतृत्व और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों को साथ लेकर चलना ही टिकाऊ विकास की पहचान है।

निष्कर्ष: भारत की असली ताकत पर्दों के पीछे नहीं, लोगों के बीच है

BRICS सम्मेलन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। इससे भारत की वैश्विक भूमिका मजबूत हो सकती है, विकासशील देशों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ सकता है, व्यापार और निवेश के नए रास्ते खुल सकते हैं तथा तकनीक और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

लेकिन सम्मेलन की सफलता का अंतिम पैमाना केवल कूटनीतिक तस्वीरें, बड़े नेताओं की मुलाकातें या अंतरराष्ट्रीय घोषणाएं नहीं होनी चाहिए। सफलता तब होगी, जब इन चर्चाओं के परिणाम भारत की अर्थव्यवस्था, उद्योग, रोजगार और आम नागरिक की जिंदगी में दिखाई दें।

दिल्ली की झुग्गियों के आसपास लगाए गए पर्दों का विवाद हमें यह याद दिलाता है कि विकास की तस्वीर अधूरी है, यदि उसमें गरीबों के अधिकार और सम्मान शामिल नहीं हैं।

भारत को ऐसी राजधानी चाहिए, जो साफ-सुथरी और आधुनिक हो, लेकिन अपने गरीब नागरिकों को छिपाकर नहीं। भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जो दुनिया में मजबूत हो, लेकिन उसका लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित न रहे। भारत को ऐसा विकास चाहिए, जिसमें विदेशी मेहमानों का स्वागत भी हो और झुग्गी में रहने वाले परिवारों के भविष्य की चिंता भी।

आखिर भारत की असली ताकत क्या है—दुनिया को दिखाने के लिए लगाए गए पर्दे, या उन पर्दों के पीछे रहने वाले करोड़ों नागरिकों का बेहतर भविष्य?

यह सवाल केवल BRICS सम्मेलन का नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा का सवाल है। और इस सवाल का जवाब आने वाले वर्षों में हमारी नीतियां, हमारी प्राथमिकताएं और हमारे फैसले देंगे।

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