नई दिल्ली। भारत और जापान के रिश्ते आज केवल कूटनीतिक संवाद और व्यापारिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग अब तकनीक, बुनियादी ढांचे, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हरित ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे भविष्य के क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। इस बदलते रिश्ते के पीछे जिस व्यक्तिगत संबंध को अक्सर अहम माना जाता है, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दोस्ती का विशेष स्थान रहा है।
भारत-जापान संबंधों की इस यात्रा को समझें तो यह कहानी सिर्फ दो सरकारों के बीच सहयोग की नहीं, बल्कि दो नेताओं के बीच बने भरोसे से दो देशों के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनने की भी है।
7 अक्टूबर 2001 से शुरू हुआ एक अलग राजनीतिक सफर
7 अक्टूबर 2001 का दिन नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में बेहद महत्वपूर्ण था। इसी दिन उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इसके बाद गुजरात और जापान के बीच आर्थिक तथा औद्योगिक सहयोग को लेकर उनकी सक्रियता बढ़ी।
मोदी और शिंजो आबे की पहली मुलाकात 2007 में जापान यात्रा के दौरान हुई। उस समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और आबे जापान के प्रधानमंत्री। यह मुलाकात आगे चलकर एक ऐसे व्यक्तिगत संबंध में बदली, जिसने भारत-जापान रिश्तों को राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर नई मजबूती दी।
दोनों नेताओं के बीच संवाद में केवल सरकारी मुद्दे ही नहीं, बल्कि भारत और जापान की सभ्यताओं, संस्कृति और भविष्य की संभावनाओं को लेकर भी समान सोच दिखाई देती थी।
आबे के लिए मजबूत भारत और भारत के लिए मजबूत जापान
अगस्त 2007 में शिंजो आबे भारत दौरे पर आए। उस दौरान उन्होंने भारतीय संसद को संबोधित किया। उनके संदेश में भारत और जापान के संबंधों को भविष्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया था।
आबे की सोच थी कि जापान के हित में एक मजबूत भारत और भारत के हित में एक मजबूत जापान होना चाहिए। यही विचार आने वाले वर्षों में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी का आधार बनता गया।
मोदी और आबे की दोस्ती का असर भी धीरे-धीरे सरकारी नीतियों में दिखाई देने लगा। दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा हितों पर काम करना शुरू किया।
काशी और क्योटो ने जोड़ी दो प्राचीन सभ्यताओं की कड़ी
भारत और जापान के संबंधों में 2014 का वर्ष भी महत्वपूर्ण रहा। वाराणसी और जापान के क्योटो शहर के बीच साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। दोनों शहरों की पहचान उनकी प्राचीन संस्कृति, धार्मिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व के कारण है।
यह साझेदारी केवल शहरों के बीच समझौता नहीं थी। इसके पीछे दोनों देशों की सांस्कृतिक समानताओं और विरासत को एक-दूसरे से जोड़ने का प्रयास भी था।
इसके बाद 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे वाराणसी पहुंचे। काशी की गंगा आरती में दोनों नेताओं की मौजूदगी ने भारत-जापान रिश्तों को एक अलग सांस्कृतिक आयाम दिया।
यह तस्वीर दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों से कहीं आगे जाकर जनता के बीच भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बनी।
बुलेट ट्रेन बनी भारत-जापान सहयोग की बड़ी पहचान
भारत-जापान साझेदारी का सबसे चर्चित उदाहरण मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना रही। 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे की मौजूदगी में इस परियोजना की आधारशिला रखी गई।
जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय सहयोग के साथ भारत में हाई-स्पीड रेल नेटवर्क की दिशा में यह एक बड़ा कदम माना गया।
इसके अलावा दिल्ली मेट्रो, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं में भी जापान का सहयोग भारत के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण रहा है।
इन परियोजनाओं ने दोनों देशों के रिश्तों को जमीन पर दिखाई देने वाला स्वरूप दिया।
2018 में दोस्ती को मिला व्यक्तिगत रंग
2018 में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा के दौरान शिंजो आबे ने उन्हें यामानाशी स्थित अपने निजी आवास पर आमंत्रित किया। दोनों नेताओं की यह मुलाकात इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि इसमें औपचारिक सरकारी कार्यक्रमों से अलग व्यक्तिगत आत्मीयता दिखाई दी।
राजनीति में लंबे समय तक बने रिश्तों में व्यक्तिगत भरोसा अक्सर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मोदी और आबे के संबंध इसका एक उदाहरण माने जाते हैं।
दोनों नेताओं के बीच यह विश्वास बाद में भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी की मजबूती में भी दिखाई दिया।
आबे को भारत ने दिया पद्म विभूषण सम्मान
शिंजो आबे के भारत के साथ संबंधों और उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2021 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
यह सम्मान भारत और जापान के बीच संबंधों को मजबूत करने में आबे की भूमिका की एक बड़ी मान्यता थी।
आबे का भारत के प्रति जुड़ाव केवल प्रधानमंत्री पद तक सीमित नहीं था। उनके राजनीतिक दृष्टिकोण में भारत को जापान की विदेश नीति और व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति में विशेष महत्व प्राप्त था।
2022 में दोस्ती का भावुक अध्याय
जुलाई 2022 में शिंजो आबे के निधन के बाद भारत और जापान के संबंधों का यह व्यक्तिगत अध्याय बेहद भावुक हो गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सितंबर 2022 में जापान पहुंचे और आबे के राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल हुए। उन्होंने आबे की पत्नी अकी आबे से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की।
आबे के निधन के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भी कई अवसरों पर उनके साथ अपने संबंधों और भारत-जापान रिश्तों में उनके योगदान को याद किया।
तुलसीदास की पंक्ति—“निज दुख गिरिसम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना”—का भाव भी ऐसे रिश्ते को समझने में मदद करता है, जहां व्यक्तिगत मित्रता औपचारिक राजनीति से आगे निकल जाती है।
आज भारत में करीब 1,400 जापानी कंपनियां
आज भारत-जापान आर्थिक संबंध काफी व्यापक हो चुके हैं। भारत में करीब 1,400 जापानी कंपनियां काम कर रही हैं और जापानी निवेश तथा तकनीकी सहयोग का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
जापानी कंपनियों की मौजूदगी ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय सेवाओं, विनिर्माण और तकनीकी क्षेत्रों तक फैली हुई है।
भारत की विशाल युवा आबादी और बढ़ता बाजार जापान के लिए अवसर पैदा करता है, जबकि जापान की तकनीकी क्षमता, पूंजी और औद्योगिक अनुभव भारत के विकास में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
यही वजह है कि दोनों देशों का सहयोग अब पारंपरिक उद्योगों से आगे निकलकर भविष्य की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।
सेमीकंडक्टर से ग्रीन हाइड्रोजन तक नई साझेदारी
भारत-जापान सहयोग का अगला चरण उन क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है, जिन्हें आने वाली अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक माना जा रहा है।
सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्रीन हाइड्रोजन और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों में दोनों देश सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
सरल शब्दों में कहा जाए तो जापान के पास तकनीकी अनुभव और औद्योगिक विशेषज्ञता है, जबकि भारत के पास बड़ा बाजार, युवा प्रतिभा और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था है।
दोनों की ताकत जब एक साथ आती है तो इससे केवल व्यापार नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन और तकनीकी व्यवस्था में भी दोनों देशों की भूमिका मजबूत हो सकती है।
दोस्ती से आगे बढ़कर संस्थागत साझेदारी
मोदी और आबे के व्यक्तिगत रिश्ते की चर्चा अक्सर भारत-जापान संबंधों के संदर्भ में होती है, लेकिन आज दोनों देशों का संबंध किसी एक नेता या सरकार तक सीमित नहीं है।
पिछले वर्षों में दोनों देशों के बीच ऐसे संस्थागत तंत्र विकसित हुए हैं, जो राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव के बावजूद सहयोग को जारी रखने में मदद करते हैं।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला को लेकर भारत और जापान के हित भी कई स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
यानी जिस रिश्ते को कभी व्यक्तिगत दोस्ती के रूप में देखा जाता था, वह अब व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुका है।
25 साल के सफर में बदली रिश्तों की तस्वीर
7 अक्टूबर 2001 से नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक यात्रा शुरू हुई थी। अगले वर्षों में शिंजो आबे के साथ उनकी मुलाकात और दोस्ती ने भारत-जापान रिश्तों को एक नई दिशा देने में भूमिका निभाई।
2007 की पहली मुलाकात से लेकर काशी की गंगा आरती, काशी-क्योटो साझेदारी, बुलेट ट्रेन परियोजना, यामानाशी की निजी मुलाकात और आबे को पद्म विभूषण दिए जाने तक इस रिश्ते के कई यादगार पड़ाव रहे।
आज दोनों देशों की साझेदारी जिस मुकाम पर है, उसमें उस दौर के राजनीतिक विश्वास की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
भारत के लिए जापान केवल एक निवेशक या तकनीकी सहयोगी नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। वहीं जापान के लिए भारत एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल युवा शक्ति और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का एक अहम देश है।
आने वाले वर्षों में यदि सेमीकंडक्टर, एआई, हरित ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग और गहरा होता है, तो भारत-जापान संबंधों की यह कहानी एक नए अध्याय में प्रवेश करेगी।
दोस्ती की नींव पर शुरू हुआ यह रिश्ता अब तकनीक, विकास और रणनीतिक भरोसे की साझेदारी बन चुका है—और मोदी-आबे की मित्रता इस यात्रा की सबसे यादगार कड़ियों में शामिल रहेगी।
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