लखनऊ: उत्तर प्रदेश में होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक डॉक्टरों एवं इंटर्न्स के स्टाइपेंड को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब लगातार तेज होता जा रहा है। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे आयुष डॉक्टरों और इंटर्न्स का कहना है कि उन्हें वर्षों से महज ₹7,500 का मासिक स्टाइपेंड दिया जा रहा है, जबकि अन्य चिकित्सा पद्धतियों के इंटर्न्स को करीब ₹25,000 तक स्टाइपेंड मिल रहा है। डॉक्टरों का सवाल है कि जब वे भी मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण की प्रक्रिया से गुजरकर मरीजों की सेवा कर रहे हैं, तो उनके स्टाइपेंड में इतना बड़ा अंतर क्यों रखा गया है?
आंदोलन कर रहे डॉक्टरों के मुताबिक, वर्ष 2011 से उनके स्टाइपेंड में कोई प्रभावी बढ़ोतरी नहीं हुई है। उनका कहना है कि वर्ष 2011 में ₹7,500 का स्टाइपेंड किसी तरह व्यावहारिक हो सकता था, लेकिन वर्ष 2026 में महंगाई के मौजूदा स्तर को देखते हुए इतनी राशि में लखनऊ जैसे शहर में रहना, खाना, यात्रा करना और अपनी पढ़ाई एवं प्रशिक्षण से जुड़े खर्चों को पूरा करना बेहद मुश्किल है।
इसी मांग को लेकर आयुष डॉक्टर और इंटर्न्स पिछले कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उनका उद्देश्य मरीजों को परेशान करना नहीं है, बल्कि सरकार तक अपनी बात पहुंचाना है। आंदोलन के दौरान उन्होंने इमरजेंसी सेवाएं जारी रखने की बात कही है, जबकि नियमित ओपीडी सेवाओं को प्रभावित करने का निर्णय अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने के लिए लिया गया है।
ब्रजेश पाठक से मुलाकात के बाद भी नहीं बनी बात
आंदोलन कर रहे डॉक्टरों के अनुसार, हाल ही में उन्होंने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में डॉक्टरों ने अपनी समस्याओं और स्टाइपेंड में असमानता का मुद्दा उठाया।
डॉक्टरों का कहना है कि मुलाकात के दौरान उन्हें आश्वासन दिया गया था कि उनकी समस्याओं को लेकर आयुष मंत्री के साथ बैठक कराई जाएगी और प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों को बातचीत के लिए बुलाया जाएगा। डॉक्टरों के मुताबिक, करीब 10 लोगों के नाम भी दिए गए थे, लेकिन इसके बाद उन्हें बैठक के संबंध में कोई स्पष्ट सूचना नहीं मिली।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का आरोप है कि उन्हें बार-बार आश्वासन तो मिल रहा है, लेकिन मांगों पर ठोस निर्णय नहीं हो रहा। उनका कहना है कि अब उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि सरकार की ओर से लिखित और स्पष्ट घोषणा चाहिए।
एक प्रदर्शनकारी डॉक्टर ने कहा कि उनकी मांग कोई अतिरिक्त सुविधा हासिल करने की नहीं है, बल्कि वे दूसरे इंटर्न्स के समान स्टाइपेंड की मांग कर रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, जब दूसरे पैथी के इंटर्न्स को ₹25,000 तक स्टाइपेंड दिया जा सकता है, तो आयुष के इंटर्न्स के लिए ₹7,500 की राशि क्यों तय है?
“आश्वासन नहीं, ऐलान चाहिए”
धरना दे रहे डॉक्टरों के बीच सबसे प्रमुख नारा है—“आयुष को दो सम्मान, ₹25,000 का करो ऐलान।”
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांग सरकार के सामने रख रहे हैं। उनके अनुसार वर्ष 2021 से लगातार उन्हें आश्वासन मिल रहे हैं, जबकि स्टाइपेंड की वास्तविक राशि में अपेक्षित बदलाव नहीं हुआ।
डॉक्टरों का कहना है कि सरकार और संबंधित विभाग से अब उनकी मांग है कि कागजी कार्रवाई और आश्वासन के बजाय ऐसा आदेश जारी किया जाए जिसमें स्पष्ट रूप से स्टाइपेंड बढ़ाने की बात हो।
एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि “अब आश्वासन का चूर्ण नहीं चाहिए, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई चाहिए।” डॉक्टरों का कहना है कि यदि उनकी मांग स्वीकार कर ली जाती है तो आंदोलन समाप्त किया जा सकता है और वे नियमित रूप से मरीजों की सेवा में लौटना चाहते हैं।
लखनऊ में ₹7,500 में गुजारा मुश्किल होने का दावा
आंदोलन कर रहे डॉक्टरों ने लखनऊ में रहने की बढ़ती लागत को भी अपनी मांग का प्रमुख आधार बनाया है। उनका कहना है कि शहर में कमरे का किराया, भोजन, आने-जाने का खर्च और अन्य जरूरी खर्च मिलाकर ₹7,500 का स्टाइपेंड बेहद कम पड़ता है।
प्रदर्शनकारियों के अनुसार, लखनऊ के कई इलाकों में किराए का कमरा ही हजारों रुपये में मिल रहा है। इसके अलावा रोजमर्रा के भोजन और परिवहन का खर्च अलग है। ऐसे में एक प्रशिक्षु डॉक्टर से अस्पताल में कई घंटे ड्यूटी की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उसके बदले मिलने वाला स्टाइपेंड उसकी बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पा रहा है।
डॉक्टरों का कहना है कि वे अपने परिवार से दूर रहकर इंटर्नशिप और अस्पताल की ड्यूटी करते हैं। ऐसे में उन्हें मिलने वाले स्टाइपेंड का बड़ा हिस्सा केवल रहने और खाने में ही खर्च हो जाता है।
“समान परीक्षा, फिर स्टाइपेंड में अंतर क्यों?”
आंदोलनकारी डॉक्टरों ने मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया और प्रशिक्षण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वे भी NEET जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षा के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश लेते हैं और वर्षों तक पढ़ाई करने के बाद इंटर्नशिप करते हैं।
डॉक्टरों का सवाल है कि यदि अलग-अलग पैथी के विद्यार्थियों से चिकित्सा शिक्षा के दौरान समान स्तर की मेहनत और प्रशिक्षण की अपेक्षा की जाती है, तो इंटर्नशिप के दौरान मिलने वाले स्टाइपेंड में इतना बड़ा अंतर क्यों होना चाहिए?
उनका कहना है कि वे अस्पतालों में ओपीडी, आईपीडी और अन्य निर्धारित सेवाओं में जिम्मेदारी निभाते हैं। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, मरीजों के साथ काम करने और अस्पताल की ड्यूटी करने के मामले में उनकी जिम्मेदारियां भी गंभीर हैं।
एक डॉक्टर ने कहा कि वे “समान काम के लिए समान स्टाइपेंड” की मांग कर रहे हैं और सरकार से किसी विशेष अतिरिक्त लाभ की मांग नहीं कर रहे।
इमरजेंसी सेवा जारी रखने का दावा
हड़ताल के बीच मरीजों को लेकर उठ रहे सवालों पर प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि इमरजेंसी सेवाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया गया है।
डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों को गंभीर स्थिति में परेशानी न हो, इसलिए इमरजेंसी सेवा जारी रखने का निर्णय लिया गया है। हालांकि नियमित ओपीडी सेवाओं को लेकर आंदोलन के कारण असर पड़ रहा है।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि वे मरीजों को परेशान नहीं करना चाहते। उनका उद्देश्य सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित करना है। उनका दावा है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेती है तो आंदोलन समाप्त कर अस्पतालों में सामान्य सेवाएं बहाल की जा सकती हैं।
एक प्रदर्शनकारी डॉक्टर ने कहा कि डॉक्टरों का मरीजों के प्रति दायित्व अपनी जगह है, लेकिन अपनी समस्याओं को सरकार के सामने रखना भी उनका अधिकार है।
पूरे उत्तर प्रदेश की आवाज होने का दावा
आंदोलन कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल लखनऊ के किसी एक कॉलेज या अस्पताल की समस्या नहीं है। उनके मुताबिक, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आयुष डॉक्टर और इंटर्न्स इस मुद्दे से जुड़े हुए हैं।
डॉक्टरों का दावा है कि प्रदेश के अलग-अलग स्थानों से बड़ी संख्या में लोग आंदोलन में शामिल हो रहे हैं और आज लखनऊ में 500 से अधिक डॉक्टरों के पहुंचने की बात कही जा रही है।
इनका कहना है कि यदि समस्या केवल एक संस्थान तक सीमित होती तो इसे स्थानीय स्तर पर हल किया जा सकता था, लेकिन जब अलग-अलग स्थानों के डॉक्टर समान समस्या उठा रहे हैं तो सरकार को इसे व्यापक स्तर पर देखना चाहिए।
2011 से ₹7,500 पर सवाल
आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि वर्ष 2011 में तय किया गया ₹7,500 का स्टाइपेंड आज भी क्यों जारी है।
प्रदर्शनकारियों ने महंगाई का उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले 15 वर्षों में किराए, भोजन, परिवहन, शिक्षा और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में काफी वृद्धि हुई है। अस्पतालों में मरीजों से जुड़े कई शुल्क भी समय के साथ बढ़े हैं, लेकिन उनके अनुसार इंटर्न्स का स्टाइपेंड उसी स्तर पर बना हुआ है।
डॉक्टरों का कहना है कि यदि सरकार समय के साथ शुल्क और अन्य व्यवस्थाओं में बदलाव कर सकती है तो प्रशिक्षु डॉक्टरों के स्टाइपेंड की समीक्षा भी नियमित अंतराल पर होनी चाहिए।
उनका तर्क है कि महंगाई के साथ स्टाइपेंड में संशोधन न होने से आर्थिक दबाव सीधे उन विद्यार्थियों पर पड़ता है जो पहले ही वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद इंटर्नशिप कर रहे हैं।
“आयुष को बढ़ावा देने की बात, लेकिन डॉक्टरों के स्टाइपेंड पर चुप्पी क्यों?”
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने आयुष चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने की सरकारी नीति पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यदि देश और दुनिया में आयुष चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने की बात की जा रही है, तो आयुष से जुड़े डॉक्टरों और इंटर्न्स की समस्याओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
डॉक्टरों का कहना है कि वे चाहते हैं कि सरकार आयुष चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करे और इसके लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों को भी उचित सम्मान और आर्थिक सहयोग मिले।
उनका कहना है कि स्टाइपेंड की राशि केवल पैसे का सवाल नहीं है, बल्कि यह उनके काम और प्रशिक्षण के प्रति संस्थागत सम्मान से भी जुड़ा हुआ है।
“हम भी डॉक्टर हैं, हमें भी सम्मान चाहिए”
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों को लेकर बहस अपनी जगह हो सकती है, लेकिन इंटर्न के रूप में अस्पताल में जिम्मेदारी निभाने वाले विद्यार्थियों के साथ आर्थिक व्यवहार में इतना बड़ा अंतर उचित नहीं होना चाहिए।
उनका कहना है कि वे चार वर्ष या उससे अधिक की चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के बाद इंटर्नशिप करते हैं और अस्पताल में मरीजों के साथ सीधे काम करते हैं। ऐसे में उनका स्टाइपेंड इतना कम होना उनके लिए आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानी पैदा करता है।
एक डॉक्टर ने कहा कि वे “समान अधिकार” की मांग कर रहे हैं और चाहते हैं कि सरकार उनकी समस्या को गंभीरता से सुने।
आज ईको गार्डन में फिर जुटेंगे डॉक्टर
आंदोलनकारियों के मुताबिक, मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण आज भी लखनऊ के ईको गार्डन में धरना जारी रहेगा। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से डॉक्टरों और इंटर्न्स के पहुंचने की बात कही गई है।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं। उनकी प्रमुख मांग स्टाइपेंड को ₹7,500 से बढ़ाकर ₹25,000 किए जाने की है।
अब देखना यह होगा कि सरकार और आयुष विभाग इस आंदोलन को लेकर क्या निर्णय लेते हैं। डॉक्टरों को उम्मीद है कि सरकार उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत करेगी और लंबे समय से लंबित स्टाइपेंड के मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय सामने आएगा।
फिलहाल आयुष डॉक्टरों और इंटर्न्स का आंदोलन इस सवाल के साथ जारी है कि जब चिकित्सा क्षेत्र में प्रशिक्षु डॉक्टरों से जिम्मेदारी और सेवा की अपेक्षा समान है, तो उनके स्टाइपेंड में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
डॉक्टरों का कहना है कि वे मरीजों की सेवा से पीछे नहीं हटना चाहते, लेकिन अपनी आर्थिक और पेशेवर मांगों को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करना भी जरूरी है। उनका स्पष्ट संदेश है—“अब आश्वासन नहीं, ऐलान चाहिए।”
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