उत्तर प्रदेश में इन दिनों बारिश का दौर जारी है। करीब तीस घंटे से रुक-रुककर बारिश हो रही है। कहीं बारिश तेज है तो कहीं धीमी, कई स्थानों पर हवा भी चल रही है। बारिश कोई असामान्य घटना नहीं है। उत्तर प्रदेश में मानसून के दौरान ऐसी परिस्थितियां आती रहती हैं।
लेकिन सवाल बारिश का नहीं है।
सवाल उस बिजली व्यवस्था का है, जिसे लेकर उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी यूपीपीसीएल की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि व्यवस्था मजबूत है, कर्मचारी सक्रिय हैं और उपभोक्ताओं को बेहतर बिजली आपूर्ति देने के लिए पूरा सिस्टम तैयार है।
अगर व्यवस्था इतनी मजबूत है तो फिर राजधानी लखनऊ में कुछ घंटों की तेज बारिश और हवा के बाद कई इलाकों में घंटों बिजली क्यों गायब हो जाती है?
कुछ दिन पहले लखनऊ में बारिश और तेज हवा के दौरान कई क्षेत्रों में करीब आठ घंटे तक बिजली बाधित रहने की शिकायतें सामने आईं। अब एक बार फिर लगातार हो रही बारिश के दौरान राजधानी के अनेक इलाकों में बिजली आपूर्ति प्रभावित होने, बिजली न आने और कई स्थानों पर लो वोल्टेज की समस्या की बातें सामने आ रही हैं।
यह सवाल केवल बिजली जाने का नहीं है।
यह सवाल बिजली व्यवस्था की तैयारी, जवाबदेही और आपदा के समय प्रतिक्रिया क्षमता का है।
बारिश आते ही व्यवस्था क्यों चरमरा जाती है?
बारिश के दौरान बिजली आपूर्ति में कुछ व्यवधान होना असंभव नहीं है। तेज हवा, पेड़ गिरना, तारों का टूटना या अन्य तकनीकी कारणों से बिजली बाधित हो सकती है।
लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में बिजली विभाग कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देता है।
अगर किसी इलाके में घंटों बिजली नहीं है, उपभोक्ता शिकायत करना चाहता है और संबंधित अधिकारी या जेई फोन तक नहीं उठाते, तो आम आदमी आखिर अपनी समस्या किसके सामने रखे?
लखनऊ जैसे शहर में, जहां प्रदेश की राजधानी स्थित है, अगर उपभोक्ता को अपनी शिकायत के लिए जिम्मेदार अधिकारी से संपर्क करने में ही परेशानी हो तो व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लौलई क्षेत्र को ही उदाहरण के तौर पर लें। स्थानीय लोगों की ओर से जेई का फोन नहीं उठाने की शिकायतें बताई जाती हैं। यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि छोटे-मोटे कामों के लिए भी कथित तौर पर पैसे की मांग की जाती है।
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
क्योंकि यदि किसी सरकारी विभाग के कर्मचारी या अधिकारी पर जनता से काम कराने के बदले पैसे मांगने का आरोप लगता है तो यह केवल उस व्यक्ति का विषय नहीं रह जाता। यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और निगरानी से जुड़ा सवाल बन जाता है।
अधिकारी फोन नहीं उठाएंगे तो शिकायत कहां जाएगी?
एक सामान्य उपभोक्ता के लिए बिजली विभाग का जेई या संबंधित अधिकारी सबसे महत्वपूर्ण संपर्क बिंदुओं में से एक होता है।
जब इलाके में बिजली चली जाए, तार टूट जाए, लो वोल्टेज की समस्या हो या कोई तकनीकी संकट पैदा हो, तब आम आदमी के पास यही उम्मीद होती है कि विभाग का जिम्मेदार अधिकारी उसकी बात सुनेगा।
लेकिन यदि फोन ही नहीं उठे तो?
क्या जनता सिर्फ बिजली बिल जमा करने के लिए है?
क्या अधिकारी और कर्मचारी सिर्फ कार्यालय में बैठने के लिए हैं?
या उनका पहला दायित्व जनता की समस्या को सुनना और उसका समाधान सुनिश्चित करना भी है?
ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं हैं। ये सवाल व्यवस्था से हैं।
और अगर किसी क्षेत्र में लगातार ऐसी शिकायतें आ रही हैं तो विभाग को उन शिकायतों की जांच करनी चाहिए।
राजधानी का हाल ऐसा है तो बाकी प्रदेश का क्या?
लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है।
यह वह शहर है जहां प्रदेश सरकार बैठती है, बड़े-बड़े विभागों के मुख्यालय हैं और प्रशासनिक तंत्र की निगरानी अपेक्षाकृत अधिक होती है।
ऐसे में अगर राजधानी के कई इलाकों में सामान्य बारिश और हवा के दौरान बिजली व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावित होती है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि प्रदेश के दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थिति कैसी होगी?
क्या वहां भी थोड़ी तेज हवा या बारिश के बाद बिजली व्यवस्था लंबे समय के लिए प्रभावित हो जाती है?
क्या वहां भी उपभोक्ताओं को अधिकारियों से संपर्क करने में परेशानी होती है?
क्या वहां भी लो वोल्टेज और लंबे पावर कट की शिकायतें आती हैं?
इन सवालों का जवाब आंकड़ों और वास्तविक ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर सामने आना चाहिए।
दूसरे राज्यों से सीखने में हर्ज क्या है?
अब यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल है।
अगर देश के कुछ ऐसे राज्य और क्षेत्र हैं जहां लगातार बड़े तूफान, चक्रवात और खराब मौसम की परिस्थितियां आती हैं और वहां बिजली व्यवस्था को अपेक्षाकृत तेजी से बहाल करने के लिए अलग तरह की तैयारी की गई है, तो उत्तर प्रदेश उन व्यवस्थाओं का अध्ययन क्यों नहीं कर सकता?
मैं स्वयं पश्चिम बंगाल का दौरा कर चुका हूं।
वहां ऐसे तूफान देखने को मिलते हैं जिनमें परिस्थितियां बेहद कठिन हो जाती हैं। तेज हवाओं के बीच गाड़ियां तक प्रभावित हो जाती हैं। इसके बावजूद कई परिस्थितियों में बिजली व्यवस्था को कुछ समय के भीतर बहाल करने के लिए वहां जिस तरह की तैयारी और प्रतिक्रिया प्रणाली अपनाई जाती है, उससे सीख ली जा सकती है।
ओडिशा भी चक्रवातों के लिहाज से बेहद संवेदनशील राज्य है।
केरल और तमिलनाडु में भी मौसम संबंधी गंभीर परिस्थितियां सामने आती रहती हैं।
तो सवाल यह है कि वहां की व्यवस्थाओं का अध्ययन उत्तर प्रदेश क्यों नहीं कर सकता?
यूपीपीसीएल के अधिकारियों और कर्मचारियों को ऐसे राज्यों में भेजा जा सकता है, जहां खराब मौसम के दौरान बिजली आपूर्ति को संभालने के लिए बेहतर तकनीकी और प्रबंधन व्यवस्था विकसित की गई है।
वे वहां जाकर देखें कि फील्ड रिस्पॉन्स कैसे तैयार किया जाता है।
फॉल्ट की पहचान कितनी जल्दी होती है।
टीमें कैसे तैनात की जाती हैं।
आपात स्थिति में प्राथमिकता कैसे तय होती है।
और सबसे महत्वपूर्ण—बिजली बहाली का समय कैसे कम किया जाता है।
सीखने में कोई छोटापन नहीं होता
किसी दूसरे राज्य या शहर की अच्छी व्यवस्था से सीखना कमजोरी नहीं है।
बल्कि यह किसी भी मजबूत प्रशासन की पहचान है।
लखनऊ में स्वच्छ वायु और कचरा प्रबंधन जैसे विषयों पर भी दूसरे स्थानों से टीमें आकर यहां की व्यवस्थाओं को समझने का प्रयास करती हैं।
नगर निगम से जुड़ी व्यवस्थाओं को देखने, समझने और अपने क्षेत्र में लागू करने के लिए बाहर से टीमें आती हैं।
यह उस व्यवस्था की उपलब्धि है कि दूसरे लोग उससे सीखने के लिए आते हैं।
ठीक यही सोच बिजली विभाग में भी होनी चाहिए।
अगर किसी राज्य ने बिजली व्यवस्था को कठिन मौसम के लिए बेहतर ढंग से तैयार किया है तो उत्तर प्रदेश को वहां से सीखने में संकोच नहीं होना चाहिए।
केवल दावा नहीं, व्यवस्था जमीन पर दिखनी चाहिए
उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की बात लगातार कही जाती है।
लेकिन उत्तम प्रदेश केवल बड़े प्रोजेक्ट और बड़े दावों से नहीं बनता।
एक आम नागरिक के लिए उत्तम प्रदेश का मतलब यह भी है कि बारिश में बिजली कितनी देर में आती है।
फॉल्ट होने पर शिकायत कितनी जल्दी सुनी जाती है।
फोन करने पर अधिकारी जवाब देता है या नहीं।
लो वोल्टेज की समस्या कितनी जल्दी दूर होती है।
और किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ पैसे मांगने की शिकायत आती है तो उस पर कार्रवाई होती है या नहीं।
ये छोटे दिखाई देने वाले सवाल वास्तव में जनता के रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़े हुए हैं।
प्राइवेटाइजेशन की बहस के बीच असली सवाल
बिजली विभाग के निजीकरण को लेकर भी समय-समय पर चर्चा होती रही है।
ऐसे में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या सरकारी बिजली व्यवस्था अपनी कार्यक्षमता को और बेहतर कर सकती है?
निजीकरण हो या सरकारी व्यवस्था—आम उपभोक्ता को आखिरकार चाहिए क्या?
उसे चाहिए भरोसेमंद बिजली।
समय पर शिकायत का समाधान।
जिम्मेदार अधिकारी।
तेज फॉल्ट रिस्पॉन्स।
और पारदर्शी व्यवस्था।
इसलिए बहस केवल सरकारी या निजी व्यवस्था की नहीं होनी चाहिए।
पहली बहस यह होनी चाहिए कि जनता को बेहतर सेवा कैसे मिलेगी।
अब जरूरत है प्लानिंग और इंप्लीमेंटेशन की
यूपीपीसीएल को केवल बारिश आने के बाद व्यवस्था संभालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
बारिश और आंधी से पहले ही संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान होनी चाहिए।
कहां लाइनें बार-बार प्रभावित होती हैं?
कहां ट्रांसफॉर्मर पर ज्यादा दबाव पड़ता है?
कहां लो वोल्टेज की समस्या लगातार आती है?
कहां थोड़ी हवा चलते ही बिजली चली जाती है?
कौन से क्षेत्र बार-बार शिकायतों में सामने आते हैं?
इन सभी क्षेत्रों की प्राथमिकता सूची बननी चाहिए।
फिर तय होना चाहिए कि किस क्षेत्र में पहले काम होगा।
किस इलाके में लाइन और ट्रांसफॉर्मर की क्षमता बढ़ानी है।
कहां पेड़ों और बिजली लाइनों के बीच सुरक्षित दूरी सुनिश्चित करनी है।
कहां फॉल्ट रिस्पॉन्स टीम बढ़ानी है।
और कहां अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी है।
जनता के फोन का जवाब देना व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए
एक और बेहद महत्वपूर्ण बात—फोन उठाना।
यह छोटी बात लग सकती है, लेकिन जनता के लिए यह बहुत बड़ी बात है।
जब किसी व्यक्ति के घर में घंटों बिजली नहीं होती, बुजुर्ग परेशान होते हैं, बच्चे परेशान होते हैं, पानी की मोटर नहीं चलती या किसी जरूरी उपकरण को बिजली नहीं मिलती, तब वह सबसे पहले विभाग से संपर्क करने की कोशिश करता है।
अगर उसे फोन पर कोई जवाब नहीं मिलता तो उसकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
इसलिए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए कि आपात स्थिति में जनता के फोन का जवाब कौन देगा और शिकायत आगे किस अधिकारी तक पहुंचेगी।
कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच जरूरी
जहां कहीं भी यह शिकायत सामने आती है कि बिना पैसे लिए छोटे-मोटे सरकारी काम नहीं होते, वहां विभाग को इसे सामान्य शिकायत मानकर छोड़ना नहीं चाहिए।
शिकायत की जांच होनी चाहिए।
यदि आरोप गलत हैं तो स्थिति स्पष्ट हो।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय हो।
जनता के लिए बनाई गई व्यवस्था में जनता से कथित तौर पर सुविधा शुल्क लेने की शिकायतें किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए।
यूपीपीसीएल के सामने अब चुनौती क्या है?
चुनौती सिर्फ बिजली वापस लाने की नहीं है।
चुनौती है ऐसी व्यवस्था बनाने की, जिसमें अगली बारिश आने पर वही शिकायत दोबारा न सुनाई दे।
चुनौती है कि आंधी आए तो सिस्टम पहले से तैयार हो।
चुनौती है कि फॉल्ट हो तो टीम तुरंत पहुंचे।
चुनौती है कि अधिकारी फोन उठाएं।
चुनौती है कि जनता को अपनी समस्या के लिए इधर-उधर न भटकना पड़े।
और चुनौती यह भी है कि जहां बेहतर मॉडल मौजूद हैं, वहां से सीखकर उसे उत्तर प्रदेश की जरूरत के अनुसार लागू किया जाए।
सवाल सिर्फ दो दिन की बारिश का नहीं है
आज दो दिन की बारिश ने जो सवाल खड़े किए हैं, उन्हें बारिश खत्म होने के साथ खत्म नहीं होना चाहिए।
यूपीपीसीएल को इन सवालों को एक अवसर के रूप में लेना चाहिए।
लखनऊ से शुरुआत हो सकती है।
फिर उन क्षेत्रों की पहचान हो सकती है जहां बार-बार बिजली व्यवस्था प्रभावित होती है।
अधिकारियों और कर्मचारियों की ट्रेनिंग कराई जा सकती है।
बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों और बिजली कंपनियों की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया जा सकता है।
और सबसे जरूरी—उस अध्ययन को कागज पर रखने के बजाय जमीन पर लागू किया जा सकता है।
क्योंकि व्यवस्था केवल शब्दों से मजबूत नहीं होती।
व्यवस्था मजबूत होती है प्लानिंग, ट्रेनिंग, तकनीक, जवाबदेही और ईमानदार इंप्लीमेंटेशन से।
उत्तर प्रदेश एक बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
लेकिन उस बदलाव की असली परीक्षा तब होगी जब आम आदमी बारिश की रात में बिजली जाने के बाद भी यह भरोसा रख सके कि विभाग उसकी समस्या सुनेगा और समय पर समाधान करेगा।
नई सोच नई ऊर्जा की ओर से हमारी यही अपील है—जहां व्यवस्था बेहतर है, वहां से सीखिए; जहां कमी है, उसे स्वीकारिए; और जहां जनता की शिकायत है, वहां जवाबदेही तय कीजिए।
क्योंकि बिजली सिर्फ एक सुविधा नहीं है।
यह आज के समय में आम नागरिक की रोजमर्रा की जरूरत है।
और जनता को बेहतर बिजली व्यवस्था मिलना उसका अधिकार भी है और व्यवस्था की जिम्मेदारी भी।
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