लखनऊ, 25 सितंबर। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने प्रदेश के चिकित्सकों से चिकित्सा व्यवस्था में भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर जब मरीज को दवा लिखें तो कोशिश होनी चाहिए कि दवाओं और जरूरी जांचों के नाम हिंदी अथवा देवनागरी लिपि में भी लिखे जाएं, ताकि मरीज को यह समझने में परेशानी न हो कि उसे कौन-सी दवा दी गई है और कौन-सी जांच करानी है।
ब्रजेश पाठक का कहना है कि इलाज कराने वाला व्यक्ति केवल दवा लेने वाला नहीं है, बल्कि उसे अपने उपचार के बारे में बुनियादी जानकारी भी होनी चाहिए। डॉक्टर की लिखावट और मेडिकल शब्दावली कई बार मरीज के लिए आसानी से समझ में नहीं आती। ऐसे में परिचित भाषा में जानकारी मिलने से मरीज को अपने उपचार को समझने में मदद मिल सकती है।
मरीज को पता होना चाहिए कि उसे कौन सी दवा दी गई
डिप्टी सीएम ने चिकित्सकों से आग्रह करते हुए कहा कि मरीज को यह जानकारी होनी चाहिए कि डॉक्टर ने उसके लिए कौन-सी दवा लिखी है। उन्होंने दवाओं और जांचों के नाम को हिंदी या देवनागरी में लिखने की दिशा में अधिक ध्यान देने की बात कही।
उनकी अपील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि जहां संभव हो, मरीज की सुविधा को देखते हुए हिंदी में लिखी दवाओं को प्राथमिकता दी जाए। इससे खासतौर पर उन मरीजों को सहूलियत हो सकती है, जिन्हें अंग्रेजी में लिखे मेडिकल नाम पढ़ने या समझने में परेशानी होती है।
केवल पर्चे तक सीमित न रहे भाषा का इस्तेमाल
ब्रजेश पाठक ने चिकित्सा व्यवस्था में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल को केवल लिखित पर्चे तक सीमित रखने के बजाय डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत में भी बढ़ाने का सुझाव दिया।
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में हिंदी के साथ कई स्थानीय बोलियां और भाषाएं रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने चिकित्सकों से अवधी, भोजपुरी और अन्य मातृभाषाओं में मरीजों से संवाद करने का आग्रह किया।
उनका मानना है कि जब मरीज अपनी परिचित भाषा में डॉक्टर से अपनी परेशानी बता पाएगा, तो बीमारी से जुड़ी जानकारी साझा करना उसके लिए आसान होगा। इसी तरह चिकित्सक यदि मरीज को उसकी समझ की भाषा में उपचार संबंधी बातें समझाते हैं तो दवा लेने, जांच कराने और डॉक्टर की सलाह का पालन करने में उसे अधिक सुविधा हो सकती है।
बीमारी और इलाज की जानकारी समझना भी जरूरी
अस्पताल पहुंचने वाला हर व्यक्ति मेडिकल शब्दों से परिचित हो, यह जरूरी नहीं है। कई बार मरीज डॉक्टर द्वारा बताए गए तकनीकी शब्दों को केवल सुन तो लेता है, लेकिन उनका अर्थ पूरी तरह समझ नहीं पाता।
ऐसी स्थिति में भाषा का सरल होना उपचार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। ब्रजेश पाठक ने इसी पहलू पर जोर देते हुए चिकित्सकों से मरीज की भाषाई सुविधा को ध्यान में रखने की अपील की है।
मसलन, यदि मरीज को यह स्पष्ट रूप से समझ में आ जाए कि कौन-सी दवा कब लेनी है, कितनी मात्रा में लेनी है और कौन-सी जांच आवश्यक है, तो इलाज से जुड़े निर्देशों को समझना उसके लिए आसान हो सकता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती का किया उल्लेख
ब्रजेश पाठक ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती का उल्लेख करते हुए भारतीय भाषाओं के अधिक से अधिक इस्तेमाल को लेकर संकल्प लेने की बात कही। इसी संदर्भ में उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों से भी भारतीय भाषाओं को व्यवहार में अधिक स्थान देने की अपील की।
उन्होंने कहा कि अपनी भाषा में संवाद करना केवल भाषा के सम्मान का विषय नहीं है, बल्कि आम नागरिक तक जानकारी को आसानी से पहुंचाने का माध्यम भी है।
प्रधानमंत्री मोदी का उदाहरण देकर रखी बात
डिप्टी सीएम ने अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद करते हैं।
ब्रजेश पाठक ने इसी उदाहरण के जरिए चिकित्सकों से आग्रह किया कि वे मरीजों से संवाद करते समय भाषा को बाधा न बनने दें और जरूरत के अनुसार उनकी परिचित भाषा का इस्तेमाल करें।
डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसे में भी मदद कर सकती है मातृभाषा
चिकित्सा के दौरान डॉक्टर और मरीज के बीच स्पष्ट बातचीत काफी महत्वपूर्ण होती है। मरीज अपनी समस्या जितनी स्पष्टता से बता पाएगा, डॉक्टर के लिए उसकी स्थिति को समझना उतना ही आसान होगा। दूसरी ओर डॉक्टर की सलाह मरीज को ठीक से समझ आए, यह भी उपचार का जरूरी हिस्सा है।
मातृभाषा या परिचित बोली में बातचीत होने पर मरीज कई बार अपनी परेशानी अधिक सहजता से बता सकता है। इसी वजह से ब्रजेश पाठक ने डॉक्टरों से स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की अपील की है।
हिंदी में चिकित्सा शब्दावली के इस्तेमाल पर जोर
डिप्टी सीएम की इस अपील से चिकित्सा क्षेत्र में हिंदी और देवनागरी के इस्तेमाल को लेकर चर्चा भी शुरू हो सकती है। खासकर दवाओं, जांचों और उपचार संबंधी जानकारी को मरीज की समझ के अनुरूप प्रस्तुत करना इसका प्रमुख हिस्सा है।
हालांकि, चिकित्सा क्षेत्र में दवाओं के आधिकारिक नाम और तकनीकी शब्दों की स्पष्टता भी जरूरी है। इसलिए व्यवहारिक रूप से मरीज की सुविधा और चिकित्सकीय सटीकता—दोनों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण रहेगा।
भाषा सरल होगी तो जानकारी तक पहुंच आसान होगी
ब्रजेश पाठक की अपील का मूल जोर इसी बात पर है कि इलाज से जुड़ी जरूरी जानकारी मरीज से दूर न रहे। यदि किसी मरीज को यह समझ ही न आए कि डॉक्टर ने क्या लिखा है या उसे कौन-सी दवा किस उद्देश्य से लेनी है, तो भाषा उसके लिए अतिरिक्त परेशानी बन सकती है।
इसीलिए उन्होंने चिकित्सकों से पर्चे पर हिंदी अथवा देवनागरी का इस्तेमाल बढ़ाने और मरीजों से उनकी मातृभाषा में बातचीत करने का आग्रह किया है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और भाषाई रूप से विविध राज्य में यह पहल चिकित्सा सेवाओं और मरीजों के बीच संवाद को लेकर एक अलग चर्चा को जन्म दे सकती है। फिलहाल डिप्टी सीएम की ओर से चिकित्सकों से हिंदी, देवनागरी और स्थानीय भाषाओं के अधिक इस्तेमाल की अपील सामने आई है, जिसमें मरीज की समझ और सुविधा को केंद्र में रखने पर जोर दिया गया है।
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