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नई व्यवस्था से भारतीय निर्यातकों और आयातकों को रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार का अतिरिक्त विकल्प मिलेगा, लेकिन वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ाना अभी बड़ी चुनौती

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय कारोबार में भारतीय रुपये की भूमिका बढ़ाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने 20 अगस्त 2026 को Foreign Trade Policy (FTP) 2023 के पैराग्राफ 2.52 और 2.53 में संशोधन की अधिसूचना जारी की है। सरकारी रिकॉर्ड में इसे Foreign Trade Policy में संशोधन के तौर पर दर्ज किया गया है।

इस बदलाव को भारत की उस व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें विदेशी व्यापार के भुगतान के लिए केवल अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और रुपये के इस्तेमाल के नए रास्ते तैयार करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि अब भारत का पूरा अंतरराष्ट्रीय व्यापार रुपये में होने लगेगा। यह मौजूदा विदेशी मुद्रा व्यवस्था के साथ एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में काम करेगा।

रुपये में व्यापार का रास्ता कैसे काम करता है?

रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की व्यवस्था को समझने के लिए Special Rupee Vostro Account यानी SRVA को समझना जरूरी है।

भारतीय बैंक विदेशी बैंक के लिए विशेष रुपया खाता खोल सकते हैं। इसी खाते के जरिए संबंधित देश के कारोबारी और भारतीय कारोबारी के बीच रुपये में व्यापार का निपटान किया जा सकता है।

RBI के अनुसार, SRVA के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय व्यापार का निपटान मौजूदा व्यवस्था का विकल्प खत्म करके नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त व्यवस्था के रूप में किया जाता है। इसके अलावा SRVA में मौजूद रकम को कुछ अनुमत निवेशों में इस्तेमाल करने की सुविधा भी इसे सामान्य Rupee Vostro Account से अलग बनाती है।

भारतीय कारोबारियों को क्या फायदा हो सकता है?

मान लीजिए किसी विदेशी खरीदार को भारत से सामान खरीदना है। सामान्य स्थिति में भुगतान डॉलर या किसी अन्य स्वीकार्य विदेशी मुद्रा में हो सकता है। इस प्रक्रिया में विदेशी खरीदार को अपनी मुद्रा को दूसरी मुद्रा में बदलना पड़ सकता है और भारतीय विक्रेता को प्राप्त विदेशी मुद्रा को रुपये में बदलना पड़ सकता है।

यदि दोनों देशों के बीच रुपये में भुगतान की व्यवस्था उपलब्ध है, तो इस पूरी प्रक्रिया के कुछ चरणों को कम किया जा सकता है।

इससे संभावित रूप से विदेशी मुद्रा बदलने से जुड़ी लागत, लेनदेन का समय और विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव का कुछ जोखिम कम हो सकता है। हालांकि वास्तविक बचत बैंकिंग व्यवस्था, मुद्रा दर और दोनों पक्षों के बीच तय शर्तों पर निर्भर करेगी।

डॉलर की कमी वाले देशों के लिए क्यों महत्वपूर्ण?

दुनिया के सभी देशों के पास डॉलर की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होती। कुछ देशों को विदेशी व्यापार के भुगतान के लिए डॉलर जुटाने में कठिनाई होती है। ऐसे बाजारों में रुपये में भुगतान का विकल्प भारतीय निर्यातकों के लिए कारोबार का एक अतिरिक्त रास्ता खोल सकता है।

इससे उन देशों के साथ व्यापार बढ़ाने की संभावना बन सकती है, जहां डॉलर की उपलब्धता सीमित है लेकिन भारत के साथ वस्तुओं या सेवाओं का कारोबार करने की मांग मौजूद है।

यानी रुपये में व्यापार का मकसद सिर्फ डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि भारतीय कारोबारियों को भुगतान के ज्यादा विकल्प उपलब्ध कराना भी है।

क्या इससे डॉलर की बादशाहत खत्म हो जाएगी?

ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी।

अमेरिकी डॉलर वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजार और केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत का यह कदम रुपये को अंतरराष्ट्रीय कारोबार में ज्यादा उपयोगी बनाने की दिशा में है, लेकिन इससे डॉलर की जगह रुपये के तत्काल स्थापित हो जाने की स्थिति नहीं बनती।

वास्तविक बदलाव तभी दिखाई देगा जब बड़ी संख्या में विदेशी बैंक रुपये में लेनदेन की सुविधा अपनाएं और विदेशी कंपनियां भी रुपये को भुगतान तथा निवेश के माध्यम के रूप में स्वीकार करने लगें।

सिर्फ DGFT की अधिसूचना से नहीं बदलेगी तस्वीर

रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने के लिए केवल भारत में नियमों को आसान बनाना पर्याप्त नहीं है। संबंधित विदेशी देश में भी बैंकिंग व्यवस्था, रुपये की उपलब्धता और भुगतान का बुनियादी ढांचा होना जरूरी है।

यही कारण है कि रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल का विस्तार एक लंबी प्रक्रिया है। RBI के मौजूदा ढांचे के तहत SRVA इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। RBI ने जुलाई 2026 में SRVA से संबंधित अपनी FAQs को भी अपडेट किया था।

भारत-रूस जैसे व्यापार में चुनौती अलग

रुपये में व्यापार की व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौतियों में व्यापार असंतुलन भी शामिल है।

अगर भारत किसी देश से बहुत ज्यादा सामान खरीदता है लेकिन उस देश को तुलनात्मक रूप से कम निर्यात करता है, तो उस देश के पास बड़ी मात्रा में रुपये जमा हो सकते हैं। ऐसे में विदेशी कारोबारी या बैंक उन रुपयों का इस्तेमाल कहां और किस तरह करेंगे, यह अहम सवाल बन जाता है।

इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब विदेशी साझेदारों को भारत में निवेश, भारतीय वस्तुओं की खरीद या अन्य अनुमत वित्तीय गतिविधियों के जरिए रुपये का उपयोग करने के पर्याप्त अवसर मिलें।

निर्यातकों के लिए बढ़ सकते हैं बाजार

भारत का लक्ष्य सिर्फ भुगतान की मुद्रा बदलना नहीं, बल्कि अपने निर्यात बाजार का विस्तार करना भी है। यदि किसी देश के कारोबारी डॉलर की कमी के कारण भारतीय कंपनियों से कारोबार करने में परेशानी महसूस करते हैं, तो रुपये में भुगतान का विकल्प उनके लिए एक वैकल्पिक रास्ता बन सकता है।

खासकर छोटे और मध्यम निर्यातकों के लिए यह व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है, बशर्ते संबंधित देश में बैंकिंग चैनल और रुपये में भुगतान की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो।

रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में एक और कदम

भारत पिछले कुछ वर्षों से रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने पर काम कर रहा है। RBI ने जुलाई 2022 में भारतीय रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के निपटान के लिए अलग व्यवस्था शुरू की थी। इसके बाद SRVA के जरिए विदेशी बैंकों के साथ रुपये में व्यापार निपटाने की सुविधा विकसित की गई।

अब DGFT की 20 अगस्त 2026 की अधिसूचना Foreign Trade Policy के स्तर पर इस दिशा को और स्पष्ट करती है। सरकारी अधिसूचना में FTP 2023 के पैराग्राफ 2.52 और 2.53 में संशोधन का उल्लेख है।

आगे की राह क्या होगी?

अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि कितने देश और विदेशी बैंक इस व्यवस्था को अपनाते हैं। रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विस्तार केवल सरकारी फैसले से नहीं, बल्कि विदेशी कारोबारियों के भरोसे, बैंकिंग नेटवर्क, रुपये की उपलब्धता और भारत के साथ व्यापार संतुलन पर भी निर्भर करेगा।

अगर ज्यादा देश रुपये में भुगतान स्वीकार करने लगते हैं और विदेशी बैंकों में रुपये से जुड़े खाते तथा निपटान व्यवस्था का विस्तार होता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय भूमिका मजबूत हो सकती है।

इसलिए DGFT का ताजा फैसला डॉलर को तुरंत हटाने वाला कदम नहीं, बल्कि भारत के विदेशी व्यापार में रुपये के लिए एक अतिरिक्त और व्यापक रास्ता तैयार करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए।

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