नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन ने रविवार को उस समय नया मोड़ ले लिया, जब बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च करने के लिए आगे बढ़े। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार किए जाएं, परीक्षाओं को पारदर्शी बनाया जाए, कथित परीक्षा अनियमितताओं पर जवाबदेही तय की जाए और छात्रों की समस्याओं पर सरकार तत्काल ध्यान दे।
प्रदर्शन में छात्र, अभिभावक और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग शामिल हुए। आंदोलन का समर्थन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने पहले ही “संसद चलो” अभियान का आह्वान किया था। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कई दिनों से जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना देने के बावजूद उनकी मांगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, इसलिए उन्हें संसद की ओर मार्च करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
संसद की ओर बढ़ने पर पुलिस ने रोका
जैसे ही प्रदर्शनकारी संसद मार्ग की ओर बढ़े, दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें बैरिकेडिंग पर रोक दिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई। स्थिति तनावपूर्ण होने पर पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया। कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें सामने आईं और सोशल मीडिया पर लाठीचार्ज तथा अफरा-तफरी के कई वीडियो वायरल हुए।
प्रदर्शनकारियों ने क्या कहा?
आंदोलन में शामिल छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार की हिंसा करना नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात संसद तक पहुंचाना था। उनका आरोप है कि शिक्षा व्यवस्था लगातार महंगी होती जा रही है और सरकारी संस्थानों की स्थिति कमजोर होने से आम छात्रों के लिए उच्च शिक्षा कठिन होती जा रही है।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि यदि समय रहते सरकार उनकी मांगों पर संवाद करती, तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती।
सरकार का पक्ष
सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि संसद देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है और उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। उनका कहना है कि संसद परिसर की ओर बिना अनुमति बढ़ने की किसी भी कोशिश को सुरक्षा एजेंसियां हल्के में नहीं ले सकतीं और कानून-व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक था।
विपक्ष ने किया समर्थन
इस आंदोलन को कई विपक्षी दलों का समर्थन मिला। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत कई विपक्षी नेताओं ने छात्रों की मांगों को जायज बताते हुए सरकार से संवाद करने और शिक्षा से जुड़े मुद्दों का समाधान निकालने की अपील की। विपक्ष का आरोप है कि सरकार छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही है।
शिक्षा व्यवस्था पर फिर छिड़ी बहस
इस पूरे घटनाक्रम के बाद शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक पक्ष का कहना है कि छात्रों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष संसद की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता बता रहा है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार आंदोलनकारियों के साथ बातचीत कर उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय लेती है या यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रह जाएगा।













