लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही? विपक्ष होता तो क्या लाठीचार्ज तय था—घटना ने खड़े किए कई बड़े सवाल।
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदर्शन के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने कानून-व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटनास्थल पर मौजूद हमारी टीम ने देखा कि प्रदर्शन के दौरान एक पुलिस अधिकारी को कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने घेर लिया। अधिकारी को लगातार धक्का दिया गया, एक स्थान से दूसरे स्थान तक पीछे धकेला गया और कॉलर पकड़कर खींचे जाने जैसे दृश्य भी सामने आए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पूरी घटना के दौरान पुलिस का रवैया बेहद संयमित ही नहीं, बल्कि कई लोगों की नजर में पूरी तरह रक्षात्मक दिखाई दिया। मौके पर मौजूद अधिकारी स्थिति को संभालने की कोशिश करते रहे, लेकिन किसी भी स्तर पर बल प्रयोग, लाठीचार्ज या सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कानून का व्यवहार सभी राजनीतिक दलों के लिए समान है? यदि इसी तरह किसी पुलिस अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल के प्रदर्शन में होती, तो क्या पुलिस का रवैया यही रहता? क्या तत्काल लाठीचार्ज, हिरासत और मुकदमे दर्ज नहीं किए जाते?
घटनास्थल पर मौजूद लोगों का कहना है कि पुलिस पूरी तरह स्थिति को “मैनेज” करती हुई नजर आई। कई बार ऐसा लगा कि अधिकारी किसी टकराव से बचने के लिए स्वयं पीछे हट रहे थे। यह दृश्य सोशल मीडिया पर भी तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।
यह रिपोर्ट किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि कानून के समान अनुपालन के सवाल को सामने रखती है। यदि किसी सरकारी अधिकारी के साथ अभद्रता या धक्का-मुक्की हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि कोई नियम टूटा है, तो कार्रवाई भी समान रूप से होनी चाहिए—चाहे संबंधित व्यक्ति किसी भी दल से जुड़ा हो।
अब निगाहें उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन पर हैं कि क्या इस घटना की जांच होगी और यदि वीडियो में दिखाई दे रहे कृत्य कानून के दायरे में अपराध बनते हैं, तो क्या जिम्मेदार लोगों के खिलाफ समान मानकों पर कार्रवाई की जाएगी या नहीं।













